हे प्रभु! हम आपको और आपकी मातृ शक्ति का स्मरण करते।
जिससे सभी लौकिक अलौकिक कामनाओं की सिद्धि होती है।
अब मामला भक्ति पूर्वक स्मरण करने का है।
किमेषा भक्ति:?
आपकी सम्पूर्ण सृष्टि को आपका स्वरूप मानकर इसका भजन(सेवन) भक्ति है।
जाति विद्या पद रूप यौवन का अभिमान छोड़ कर व्यवहार करना भक्ति है।
शास्त्रों सन्तों द्वारा निर्धारित विधान का
पालन भी भक्ति है।
आपके नाम रूप लीला धाम का सेवन
भक्ति है।
सब प्रकार से मर्यादा का पालन करते हुए
भक्त भगवत् चरित्रों का सुनना भी भक्ति
है।
जब सब की आत्मा में विराजित आप हमारे हैं, हम आपके। तब हमें वह शक्ति दीजिये, कि हम अपने अन्तःकरण में आपका स्मरण कर सकें।
आप कृपा करें, गुरू कृपा हो।
यही कामना सब जीवों की सतत।
भोग दृष्टि मेटें ,पथ और न शरणागत।
।। हरिः शरणम् ।।