परब्रह्म तो अन्तःकरण में और सर्वत्र सदा सर्वदा से विराजते हैं।
अन्तःकरण को मलिन करने वाले कामक्रोधादि जब तक रोज- रोज हरिकथा के अमृत जल से धुले नहीं जायेंगे, और प्रभु के किसी नाम का खाते पीते ,उठते, बैठते हर कार्य करते हुए ,स्मरण नहीं होगा ,चित्त मलिन होता रहेगा। मनुष्य तो बन नहीं पायेंगे और की तो बात ही और है।
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इसलिये वेदों ने कहा-
” मनुर्भव “
हरिगुरुसन्तों का आश्रय लें।
गीता रामायण भागवत ही गुरु हैं।
प्रयास तो करना होगा भवसागर
के पार जाने के लिए।
नहीं तो दोषी कौन?
सूखा और अकाल है
गुरुओं का।
अतः
शास्त्र और सन्त
कहीं गये नहीं
वाणी में विराजे हैं
हरिः ओ3म् तत्
सत्
।। हरिःशरणम् ।।