जिमि प्रति लाभ लोभ अधिकाई, विषय चिन्तन – आसक्ति – काम/कामना

  • क्रोध – सम्मोह(अविवेक) – स्मृति भ्रंश- बुद्धिनाश – प्रणश्यति (अधःपतन)।
    शूकर-कूकर शरीरों में जा पड़ना। वही भोग दृष्टि और पतन।
    भक्तिरसामृतसिन्धुकार पूज्य श्री रूप
    गोस्वामी, विषयप्रपंच से बुद्धि हटाने के आग्रही हैं, क्योंकि इसके विना इस जन्म में भी ,वैराग्य की कल्पना व्यर्थ है और पुनः भोग्य कर्मवशात्,अन्य शरीर की प्राप्ति ध्रुव है-

प्रापञ्चिकतया बुद्ध्या हरिसम्बन्धिवस्तुनः।
मुमुक्षुभिः परित्यागः
वैराग्यं फल्गु कथ्यते।। 1/2/258
अहन्ता ममता जन्य अविवेक से संसार के वस्तु-व्यक्ति-पदार्थ समूह को पाने की
दुरभिलाषा जब जन्मी तो इसको ही साधूपदिष्ट , स्वयं में साकार मूर्तिमान्
” लोभ ” मानिये।


“लोभ” तो शास्त्र और आचार्य श्रुति
के उपदेश से जनित संस्कार (कार्याकार्य)
की विस्मृति करा देता है फलतः ,बिगड़ी हुई बुद्धि की अशुभ वासना पतन ही कराती है ,इसमें संशय नहीं।
भैया!
यह आसुरी सम्पत् है, कामक्रोधलोभादि
के कारण,नीचे के अधःपतन शील नरक आदि लोकों में ढकेल देता है।अपना सर्वनाश भी कराता है-

त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः।
कामः क्रोधः तथा लोभः तस्मादेतत्रयं त्यजेत्।।
इन रजोगुणी, तमोगुणी वृत्तियों से बचने का उपाय नामजप पूर्वक भगवद् भजन ही है।और कोई उपाय नहीं-
चहुँ जुग जहुँ श्रुति नाम प्रभाऊ।
कलि बिसेस नहिं आन उपाऊ।।
काम क्रोध मद लोभ सब नाथ नरक के पंथ।इन परिहरि रघुबीरहिं भजहु भजहिं जेहि सन्त।।
कबीर भी चटक चोट करते हैं-
काम क्रोध मद लोभ की तब लगि घट में खान।क्या मूरख क्या पंडिता दोनों एक समान।
इसलिये भगवान् शिव ने भगवद् उन्मुख मनुष्यों की सराहना की है,जिन्हे
पहले स्वयं में और पश्चात् सभी में प्रभु ही
दीखते हैं।क्योंकि उस भक्त की वृत्ति तो
तदाकाराकारित, जित देखूँ तित श्याम मयी है-
उमा जे रामचरन रत,विगत काम मद क्रोध।निज प्रभु मय देखहिं जगत, केहि सन करहिं बिरोध।।
अब,बात तो ये है कि ,श्रीगुरुचरन सरोजरज मिले तब निज मन मुकुर की शुद्धि हो। जो जल्दी मिलती नहीं।और-
कहते हैं कि भगवान् की माया बड़ी ही प्रचण्ड है।जब हरिगुरुसन्त की दया हो तभी इससे पिण्ड छूटेगा।
नहीं तो वानर राज सुग्रीव की अनुभूति देखिये, जो सुर, नर और मुनियों को भी विषय वश और स्वयं के बानर शरीर को अत्यंत कामी कहते हुए, इससे बचने का निर्देश करते हैं-
अतिसय प्रबल देव तव माया।
छूटै राम करहु जो दाया।।
बिषय बस्य सुर नर मुनि स्वामी।
मैं पामर पसु कपि अति कामी।।
अब संसार के विस्मरण और आपके स्मरण,भजन-सेवन से, जिसे सुन्दर मृगनयनी नारी के नयन वाण नहीं बेध पाते हैं, वही सौभाग्यशाली घनघोर क्रोध और “लोभ” की अँधेरी रात में जागृत चैतन्य होकर, परमानन्द में रह सकता है।
नयन नारि सर जाहि न लागा।
घोर क्रोध तम निशि जो जागा।।
हे प्रभु! ” लोभ ” की रस्सी की फाँसी, जिस साधु पुरुष के गले में नहीं फँसी, तो पक्का मानना पड़ेगा कि वह व्यक्ति ही ,वस्तुतः आपका ” अंश ” कहलाने का अधिकारी और आपके ही जैसा है-
लोभ पास जेहिं गर न बँधाया।
सो नर तुम समान रघुराया।।
देखिये, ” लंकाकांड ” में अति संसारी,अति अहंकारी दशमुख रावण का सिर, भगवान् श्रीराम काटे जा रहे हैं,किन्तु वह काटने पर भी बार-बार बढ़ता ही जा रहा है, जैसे कि “लोभ” की रस्सी तनती ही जाती है।
तब भगवान् अपने भक्त “विभीषण” की ओर देखते हैं। उसमें सज्जन का लक्षण
घटित है – राम राम तेहि सुमिरन कीन्हा।
हृदय हरषि कपि सज्जन चीन्हा।
निष्कलुष भक्त तो स्वयं की सहज सरल
भक्तिमती बुद्धि से इसके विनाश का उपाय बताने में समर्थ है-

काटत बढ़हिं सीस समुदाई।
जिमि प्रति लाभ लोभ अधिकाई।।
मरइ न रिपु श्रम भयउ विसेषा।
राम विभीसन तन तब देखा ।।


और इसलिये, इस संसार के द्वैतभूत भय,लोभ,मोह,काम को छोड़कर, श्रीराम कृष्ण नारायण सदृश “कामतरु” की छाँव बैठना श्रेयस्कर है,जहाँ कोई डर नहीं-
भय,लोभ,मोह ,कोह,काम को। जब-
बैठे नाम-काम-तरु -तर ,डर कौन घोर घन घाम को।
यह लाभ-लोभ तो जन्म ही व्यर्थ कर देगा। इस “लोभ” पर बाबा की पैनी दृष्टि है, इसीलिये-
“जिमि प्रति लाभ लोभ अधिकाई”
यही पंक्ति, गोस्वामीजी एक जगह दूसरे प्रसंग में भी दुहराते हैं।
जब “रावण” की शक्ति ,परिवार और संपत्ति बढ़ती जाती है, और “धनपति”
कुबेर का “पुष्पक” विमान भी छीन लेता है, तब उसके “लोभ” का जल तो मानो तट बन्ध ही तोड़ देता है –

सुख संपति सुत सेन सहाई।
जय प्रताप बल बुद्धि बड़ाई।।
नित नूतन सब बाढ़त जाई।
“जिमि प्रति लाभ लोभ अधिकाई।।”

।। हरिः शरणम् ।।

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Author: Prof. Shishir Chandra Upadhyay

I am Professor of Sanskrit subject in K.B.P.G College, Mirzapur, Uttar Pradesh, India, since 1991.

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