संसार शब्द ही चलायमानता बोधक है।
” सृ ” धातु गमनार्थक होने से, संसरति इति संसारः, गच्छति इति जगत् ऐसा निर्धारित होता है। अब जब यह चल रहा है, तो कोई संचालन कर्ता है, जो इसे चला रहा है, वह सर्वसाक्षी भी है।
इसी तरह शरीर भी है।यह भी चल रहा है।मातृगर्भ में आने, आकार लेने और गर्भ से बाहर निकलने तक, यह जीव निरन्तर चल ही रहा है।शैशव से वार्धक्य और मृत्यु तक ,सब संचरणशीलता,इसे संसार से अभिन्न सिद्ध करती है।
अब शरीर भी परिवर्तन शील और उसी तरह संसार भी परिवर्तन शील।
इस परिवर्तन शीलता को अनवस्थानता भी कहते हैं। जब दोनों अस्थिर हैं, तब दोनों एक दूसरे को देखने में असमर्थ भी।
जो देख रहा है, वह निर्लेप जीवात्मा है
जो कि तद् वत् परमात्मा का अंश भाग है। यह परमात्मा स्वतन्त्र है ,लेकिन यह जीवात्मा कर्मो से परतन्त्र है-
परवश जीव स्ववश भगवन्ता ।
परमात्मा में अविद्या, अस्मिता, राग,द्वेष और अभिनिवेश जैसे पंचक्लेश नहीं होते। इसमें भी नहीं होने चाहिए, लेकिन यह बेचारा जीवात्मा रूपरसगन्धादि विषयों के आकर्षण से आकृष्ट होकर, अपना मूल स्वरूप ही विस्मृत कर बैठा।
विषयों के चिन्तन से पंचक्लेश में फँस कर,माया बस स्वरूप बिसरायोऔर बन्ध्यौ कीर मर्कट की नाईं, हो गया है।
विषयों में ऐसा गहरा अनुराग है कि, किसी इच्छित की ,जब पूर्ति नहीं होती, तब,इसमें क्रोध उपजता है।
विषयों का भोग न कर पाने पर धैर्य नहीं रहता, और काम का पुत्र ,क्रोध पैदा हो जाता है –
कामात् क्रोधोभिजायते।
यह शरीर के हर तन्त्र को झकझोर देता है।रक्तचाप बढ़ा देता है, और यहाँ तक कि आत्म/ पर हनन तक का घोर क्रूर कार्य भी करा देता है। जो कि मनुष्य के लिए गर्हणीय है।
भगवान् श्री रामानुजाचार्य ने ,कामस्य अपूर्ण -दशायां क्रोधः अभिजायते तो श्री मधुसूदन सरस्वती ने , विच्छिन्नेच्छया
अभिज्वलनात्मा क्रोधः भवति कहकर ,मानव मात्र के लिए हेय और अनुपादेय कहा।
गीता में भगवान् इसे आसुरी सम्पत् कहते हुए रजोगुण से उत्पन्न मानते हैं।यह मनुष्य की मनुष्यता लील जाने वाला बड़ा पापी और परम शत्रु है-
काम एषः क्रोध एषः रजोगुणसमुद्भवः।
महाशनो महापाप्मा विद्ध्येनमिह वैरिणम्।
अतः –
सद्गुरु कृपा से जिसका विषय निवृत हो जाय, वही स्वरूपनिष्ठ,विदितात्मा,इस परिवर्तन शील शरीर-संसार से मुक्त हो सकता है-
कामक्रोधविमुक्तानां यतीनां यतचेतसां।
अभितो ब्रह्मनिर्वाणं वर्तते विदितात्मनाम्।
गीता-5/26
अब यह तो हुआ काम के पुत्र क्रोध का मनुष्यता विरोधी एक पक्ष,जो इस जीव से अनर्थ कराकर इससे जधन्य अपराध भी कराता है। इस दृष्टि से इससे बचने और मनुष्य बने रहने का उपाय हर जीव को करना चाहिए।
अब इसका एक दूसरा पक्ष भी है, जहाँ यह “क्रोध”, गर्हणीय न होकर ग्रहणीय और धारणीय भी है।
आखिर इसको धारण करने का आग्रह क्यों?
महाभारत के युद्ध में जुए में पराजित पाण्डवों को द्रौपदी ने ” क्रोध ” जागृत करने का उपदेश दिया है।और कहा है कि ,इसके बिना आप सभी की दुरवस्था दूर नहीं होगी ,राज्यलाभ नहीं होगा और कोई आपका सम्मान भी नहीं करेगा।
जिसका किया हुआ क्रोध कभी व्यर्थ नहीं हो, युद्ध में विजयश्री दिला दे,ऐसे सफल व्यक्ति के , सभी लोग वशवर्ती हो जाते हैं-
अवन्ध्यकोपस्य विहन्तुरापदां,
भवन्ति वश्याः स्वयमेव देहिनः।
अब विचारने पर यहाँ,क्रोध करना तो आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य प्रतीत होता है। और यह दुर्गुण नहीं बल्कि सद्गुण दीखता है।
ऊपर ,जो वासना वासित विषयशायी क्रोध अनुचित था ,वही क्षत्रिय की विजय का मूल बनकर उत्साह और” वीर” भाव हेतु ,रौद्र रूप दिखाने के लिए,स्थाई
” क्रोध ” बनता है। फलस्वरुप यह क्रोध
आदरणीय भी बन जाता है।
स्मरण करें ” श्रीराम ” कथा का वह यज्ञरक्षण प्रकरण, जहाँ मुनि विश्वामित्र अयोध्या जाकर अपने यज्ञ की सुरक्षा के लिए श्रीराम और लक्ष्मण को माँग कर ले आते हैं। क्या विश्वामित्र अपने यज्ञ की रक्षा मेंं असमर्थ थे? इसलिये वह महाराज दशरथ से राजकुमारों को माँगते हैं। नहीं-
ऐसा नहीं है, वास्तविकता तो यह है कि मुनि स्वयं यज्ञरक्षण में पूर्ण समर्थ हैं।
किन्तु यदि वह स्वयं रक्षाभार उठाते तो ऐसी दशा में उन्हें ” क्रोध ” भी करना होता। और यह” क्रोध”अनुचित होता। पवित्र यज्ञविधि को भी असफल करता। क्योंकि सामान्य दशा में किया गया ऐसा अनुचित, क्रोध किसी भी पुण्यशाली के पूर्व में संरक्षित “पुण्य” को ही भस्मीभूत कर देता है।
अब इसीलिए विश्वामित्र याचना करके श्रीराम लक्ष्मण को यज्ञसाफल्य हेतु लेकर आते हैं। यज्ञ सफल होता है। इधर-
जगदम्बा” जानकी ” के जनक महाराज ” जनक ” पुत्री के विवाह हेतु स्वयंवर आयोजित करते हैं, जिसे देखने की इच्छा से विश्वामित्र श्रीराम लक्ष्मण के साथ उस स्वयंवर सभा में पधारते हैं।
नाना देशों के नरेश “सीता” से विवाह के लिए सभा में साकांक्ष सज्जीभूत विराजते हैं। जिस धनुष को उठाने पर,वर माला उनके गले में विराजती और “सीता” से उनका विवाह होता,उसे वह हिला भी न सके। वह धनुष अणुमात्र भी ऐसे नहीं डिगा (स्थान च्युत) नहीं हुआ, जैसे कामी के वचनों से ” सती” नारी का व्रती “मन”-
डिगै न संभु सरासन कैसे
कामी बचन सती मन जैसे।।
अब मुनि विश्वामित्र का आदेश होता है-
उठहु राम भंजहु भवचापा।
मेटहु तात जनक परितापा।।
धनुर्भंग अर्थ में ही यह चौपाई निश्चित रूप से आती है। लेकिन एक और दूसरा आध्यात्मिक अर्थ भी अपने मन में उपजता है-
गुरु कृपा से जब राम नाम जिह्वा पर ऊठ गया, तो निश्चित मानिये कि, भव(संसार)का चाप (धनुष) जो मुभे मार कर विदीर्ण करने को उद्यत है,वह भंजित हो गया ,टूट गया। और ऐसे नाम धारक/जापक जन(जनक) का संताप ताप सदा सदा के लिए विनष्ट भी हो गया।
अब मूल कथार्थ मेंं प्रवेश करें। यहाँ भी अनवसर एक क्रोध का अवसर आता है।
” परशुराम” जैसे पराक्रमी पधारते हैं।
अपने गुरु ” भगवान् शिव” का अमोघ और अटूट धनुष टूटा देख कर “क्रोध ” से लाल हो उठते हैं। लक्ष्मण और उनका संवाद-विवाद होता है। अपने पक्ष से युद्घ के लिए उद्यत “परशुरामजी” को देख, सभी अन्य राजाओं को बड़ा सन्तोष और सुख की अनुभूति होती है।
” शेषावतार” लक्ष्मण जी परशुराम और श्रीरामजी सभी एक दूसरे को जानते हैं। किन्तु यह सच मानिए कि लक्ष्मण जी और परशुराम जी ,दोनों ने ऐसे विषम अवसर पर, परस्पर मौलिक ” क्रोध ” नहीं किया है।
बल्कि भैया! यह ” क्रोध ” तो असली क्रोध ही नहीं है।यह तो क्रोध का अभिनय किया गया है। यदि ऐसा न होता तो सभी राजागण मिलकर संगठित होकर, भयंकर ” क्रोध” वश युद्ध करते।रक्त की नदी बहती,और आयोजित स्वयंवर का उद्देश्य, जो ” श्रीसीताराम विवाह” था,वही नष्ट हो जाता।
अतः अन्य राजा परशुराम को अपने पक्ष में वाग् युद्ध करते देख युद्ध विरत ही रहे, और मूल लक्ष्य विवाह की पूर्णता हुई।
फिर भी लक्ष्य पूर्ति के लिए “क्रोध” के अभिनय में ही “शेषावतार” लक्ष्मण जी, एक स्वाभाविक” क्रोध” की अभिव्यक्ति की तरह, कामना पूर्ति की अपूर्ति से पैदा हुए “क्रोध” को पाप कहते हैं ,जो कि वस्तुतः पाप तो है ही।हमें ऐसे” कामज” क्रोध से बचना ही होगा-
लखन कहेउ हँसि सुनहु मुनि,
क्रोध पाप कर मूल।
जेहि बस जन अनुचित करहिं,
चरहिं विश्व प्रतिकूल।।
।। हरिः शरणम् ।।