जब माँ के गर्भ में था,तब संकल्प लिया था, अब जनि (जन्म) जाउँ भजहुँ चक्रपानी। मुझे सैकडों जन्मों की याद थी। मैंने निश्चय किया था कि ,अब कोई ऐसा काम मुझसे नहीं बनेगा, जिससे किसी अन्य माँ के शरीर में जाकर ,गर्भ वास और संसार दुख की पीड़ा सहनी पड़े।
क्योंकि संसार तो दुःखालयम् अशाश्वतम् है। ऋषि प्रणीत मर्यादा का बोध कराने वाले सद्गुरु भी नहीं मिले कि जैसे वे बन्धमुक्त हैं, मैं भी हो जाउँ।
ऋषि शब्द ही ” ऋष् गतौ” इस गमन अर्थ वाली धातु से बना है। रहनी-सहनी
तो सनातन ही समझाता न ।” सनातन” मिला नहीं, अविद्या माया और ऐन्द्रिक
भोगों ने जकड़ लिया।
यह जगत् जिस पंच तत्व से विनिर्मित है, उन्ही से बना यह शरीर भी है। दोनों की बड़ी दोस्ती है।इनमें प्रत्येक आकाश, वायु,अग्नि, जल और पृथ्वी में क्रमशःप्रत्येक अपने पूर्व-पूर्व से जन्मा है।
एक के बाद अन्यों में दूसरे तीसरे का गुण स्वतः अन्तरित है।
क्रमशः आकाशादि के शब्द,स्पर्श, रूप ,रस और गन्ध गुण निश्चित हैं।जब
आकाश का गुण शब्द मात्र है, तो आकाश से जन्मे वायु में शब्द और उसका मौलिक गुण स्पर्श भी है।
वायु से अग्नि तत्व की उत्पत्ति है और
अग्नि का मूल गुण, रूप है। इसमें रूप के अतिरिक्त उसके पिता वायु का गुण स्पर्श भी है, तो पितामह का शब्द भी।
अब अग्नि से जल तत्व पैदा हुआ, जिसका स्वयं का गुण रस है। इसके अलावा इसके पिता का रूप गुण, पितामह वायु का स्पर्श और प्रपितामह आकाश का शब्द गुण भी है।
अन्तिम पंचम तत्व पृथ्वी है, जिसका अपना गुण “गन्ध” है।यह “जल”तत्व से पैदा हुई है।इसमें इसके पिता जल के रस गुण से लेकर इसके पूर्वजों का रूप,स्पर्श और शब्द भी है।
पृथ्वी से लेकर आकाश तक सभी सूक्ष्म से सूक्ष्मतर हैं।हम अपने कान, त्वचा,नेत्र, जिह्वा और नासिका जैसी ज्ञान की इन्द्रियों से क्रमशः शब्द, स्पर्श, रूप,
रस और गन्ध जैसे विषयों का उपभोग करते हैं।
इस उपभोग में पाँच कर्मेन्द्रियों – हाथ,पैर ,मुख,पायु,उपस्थ(जननेन्द्रिय)) का भी योग-प्रयोग है। इस उपभोग में
अब सबसे महत्वपूर्ण चार अन्तः इन्द्रियाँ हैं, जिनके बिना उक्त पंच ज्ञानेन्द्रिय और पंच कर्मेन्द्रिय अपना काम में असमर्थ हैं।
वे हैं- मन,बुध्दि, चित्त और अहंकार।
क्रमशः इनमें एक के बाद एक सूक्ष्मतर है। सूक्ष्म होने से श्रेष्ठ भी है।लेकिन यहाँ
सबसे पहले मन, सबसे महत्वपूर्ण है।इस तरह कुल 14 इन्द्रियाँ परिगणित हुईं।
भगवान् सभी चौदह इन्द्रियों में अपने को “मन”घोषित करते हैं-
इन्द्रियाणां च मनः चास्मि।
बिना मन की सहायता के हम किसी इन्द्रिय के विषय का उपभोग नहीं कर सकते। यदि मन नेत्र के साथ संयुक्त न हो तो सामने से कौन गया आया ,हमारी दृष्टि का विषय नहीं बन पाता।
अब यह मन है तो शुद्ध भगवत् तत्व,
लेकिन अनादि जन्मों की अनादि वासना से निरन्तर विषयों में रमण करने से, नाना शरीरों में विचरने से अपनी मौलिक अस्थिरता चंचलता को छोड़ नहीं पा रहा।
यही अस्थिरता इस जीव को निरन्तर संसार-चक्र में घुमा रही है।
विषयों में विचरने और उन्ही में सावधानी पूर्वक बसने से बेचारा बेबस है।
इसी विवशता ने इस शरीर को विषयों का आसंगी बना दिया है।
ऐसी आसक्ति है कि हम कामनाओं के दास ही बन गए हैं।
विषयान् ध्यायतो पुंसः,
सङ्गः तेषूपजायते।
सङ्गात् सञ्जायते कामः। कामात् …..
संसार के रूप रस स्पर्शादि विषयों का लगातार ध्यान करते-करते इस शरीर का इन विषयों में गहरा लगाव हो गया है।
यह लगाव ही आसक्ति है।
इसी आसक्ति(विषयासंग) से काम पैदा हुआ है। इस ” काम ” के दो अर्थ हैं-
पहला काम स्त्री उपभोग है। सनातन व्यवस्था और मर्यादा में इसे सन्तुलित करने के लिए चार आश्रमों ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और सन्यस्त का उपन्यास किया गया है। यह पहला “काम” गृहस्थ आश्रम में प्रवेश कर, सृष्टि के विकास और पितृ ऋण से मुक्ति के लिए कामवासना का धर्मपूर्वक उपभोग कर परिपूर्ण होता है।
इसी काम के लिए “गृहस्थ आश्रम” की विधि में “विवाह” यज्ञ है।और सन्तति प्राप्ति के लिए ,स्त्री के साथ ” काम “का सेवन एक संस्कार विधि है।
इस विवाह यज्ञ और गृहस्थ आश्रम में, पुत्र पाने के लिए,यह काम सेवन एक पवित्र संस्कार ” गर्भाधान संस्कार” है।
इसीलिये संस्कृत के सुकुमार कवि कालिदास , रघुवंशी राजाओं को इसी मर्यादा का पालक पोषक बताते हैं –
शैशवे अभ्यस्तविद्यानां,
यौवने विषयैषिणाम्।
वार्धक्ये मुनिवृत्तीनां,
योगेनान्ते तनुत्यजाम्।।
रघूणाम् अन्वयं वक्ष्ये।।
अब देखिये, इस मर्यादित “काम” का , मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के पूर्व पुरुष, पूर्वानुक्रम से पालन करते थे।यदि काम को इस अर्थ में लेते हैं, तो हमारी आर्ष संस्कृति ने कैसे-कैसे मनुष्य को दुःखप्रद संसार से छूटने और परमानन्द को पाने में काम का विनियोग नियमित किया था।
यही मर्यादित काम,अमर्यादित काम और विषयभोग को स्वतः तिरस्कृत कर देता है।
काम का दूसरा अर्थ कामना से है।
यही इच्छा अभिलाषा और एषणा कही गई है। आपात सुन्दर और रमणीय इस संसार में पद,पदार्थ, वस्तु, व्यक्ति, रूपया पैसा,मान,बडा़ई के लिए हम पूरा, जीवन ही खपा देते हैं। लेकिन भैय्या! समझ नहीं उपजती,समय बीत जाता है, एक के बाद इसी संसार में ,इन्हीं कामनाओं का दास बनकर चक्कर काटते,नाना शूकर कूकर से लेकर इन्द्रादि के वैषयिक भोगों और कामनाओं में अपना सर्वनाश करते रहते हैं।
मन पछितैहैं अवसर बीते।
अन्त चले उठि रीते।
मिटै न काम अगिनि तुलसी कहुँ
विषय भोग बहु घी ते।
नहीं बोध होता जल्दी-
यह संसार कागद की पुड़िया बूँद परे गल जाना है।
यह संसार ऐसे ही बदलता रहा है। लेकिन यह दुर्लभ मानव देह क्यों मिली?
जब तुलसी सूर कबीर मीरा दादू नानक मलूक रैदास जैसे गुरुओं की वाणी को ही सद् गुरु मान कर उनका चरणाश्रय लेते हुए ,उनकी वाणी का प्रसाद लेंगे, तब सब संसार ,उसमें आसक्ति और ” काम ” तो तिरोहित हो ही जायेगा।संसृति का चक्र टूट जायेगा।
हमारे वैदिक चरित्र नचिकेता ने यही तो शिक्षा दी है। प्रसिद्ध संवाद है ” यम ” और ” नचिकेता” का।
नचिकेता के पिता महर्षि उद्दालक श्वेतकेतु हैं। पिता ने एक ऐसा यज्ञ किया, जिसमें सब कुछ दान करना था। बूढ़ी और अशक्त गायों को भी दान देते, पिता को जब पुत्र नचिकेता देखते हैं,तब पूछते हैं कि हे पिता जी! आप मुझे किसको दान करेंगे। पहले तो उद्दालक ध्यान नहीं देते।लेकिन बार-बार वही कहने पर रुष्ट होकर कह देते हैं कि, तुझे “यम ” को प्रदान करता हूँ।
नचिकेता पिता की आज्ञा मान यम के यहाँ जाते हैं।यम के नहीं रहने पर तीन दिनरात भूखे प्यासे ही रह जाते हैं।
यमराज यात्रा से लौटते हैं।सूचना मिलती है। व्यग्र हो उठते हैं।और बालक को उन तीन दिन और रात्रि के लिए तीन वर देने की इच्छा करते हैं। नचिकेता वर के रुप में पितृपरितोष,अग्निविद्या का ज्ञान माँगते हैं। और अन्तिम वर के रूप में आत्म विद्या का ज्ञान माँगे जाने पर नाना प्रलोभन देकर यम उस, गुह्यतम आत्मविद्या से विरत करने का प्रयास करते हैं-
ये ये कामाः दुर्लभाः मर्त्यलोके,
सर्वान् कामान् छन्दतः प्रार्थयस्व।
इमा रामाः सरथाः सतूर्याः,
न हीदृशा लम्भनीयाः मनुष्यैः।
आभिः मत् प्रत्ताभिः परिचारयस्व।
नचिकेतः मरणं मा अनुप्राक्षीः।।
लेकिन नचिकेता ,न वित्तेन तर्पणीयो
मनुष्यः।और ,तवैव वाहाः तव नृत्यगीते, कहकर, इन कामनाओं से विरति में ही
अपना संकल्प व्यक्त करते हैं।और अन्त में विवश होकर यम ने उस अनन्त की प्राप्ति के लिए ,अनन्त कामनाओं के अन्त के लिए और संसृतिचक्र के भी अन्त के लिए “आत्म -विद्या ” का उपदेश किया है।और आज इस कराल कलि काल में
यदि ऊपर ऊक्त सन्त सद्गुरु की वाणियों का आर्ष-उच्छिष्ट प्रसाद किसी पुण्यशाली को मिले, तो वही इन कामनाओं की मार से बीमार नहीं होगा।
ऐसे जीव का मनुष्य जीवन सार्थक होगा ,जो ऐसे रैदास-तुलसी-प्रसाद को पाकर भगवच्चरणाश्रय पा जायेगा।
और ऐसे उपर्युक्त सन्तों का जिस दुर्भाग्यशाली को आधार नहीं मिला तो विषयानुराग ही रहेगा।ओर तब भगवान् उमामहेश्वर की उक्ति सार्थक होगी-
सुनहु उमा ते लोग अभागी ।
हरि तजि होंहिं बिषय अनुरागी।।
इसलिए बाबा ने हरि तजि किमपि प्रयोजन नाहीं ,कहते हुए भगवद् भजन कीर्तन कथा श्रवण को ही सन्तोष की जड़ कहा-
बिनु सन्तोष न काम नसाहीं
काम अछत सुख सपनेहुँ नाहीं।
बिनु सन्तोष कि मिटै कि कामा
थल बिहीन तरु कबहुँ कि जामा।।
।। हरिः शरणम् ।।