नवम सरल सब सन छलहीनामम भरोस हिय हरष न दीना।

मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान् श्रीराम का साधन भक्ति का अन्तिम सोपान मूलतः विश्वास है। जिसके बिना कौन सी भक्ति?
क्योंकि – बिनु बिश्वास भगति नहिं।
किसी भी लौकिक या अलौकिक कार्य की भी सफलता, बिना विश्वास के सम्भव नहीं। तब विश्वास मूर्ति भगवान् पर अविश्वास रहने पर,क्या भक्ति मिलेगी और भवभय भागेगा? कदापि नहीं।
इसलिए श्रद्धा-विश्वास-विग्रह सीताराम पर दृढ़ भरोसा होना, नवीं भक्ति का प्राण है। विश्वास के साथ श्रद्धा तो स्वयं बद्धा है। इसलिये इसके बिना जीवन ही निष्फल है-
श्रद्धा बिना धर्म नहिं होई।
बिनु महि गन्ध कि पावै कोई।।
कवनिउ सिद्धि कि बिनु बिश्वासा।
बिनु हरिभजन न भवभय नासा।।

जब श्रद्धा-विश्वास-रूप श्रीसीताराम हृद्देश में नित्य विराजित हैं, तो उनका नाम स्मरण करते हुए किसी भाँति दीनता( दुख) का अनुभव कदापि नहीं होना चाहिए।अविनाशी ईश्वर राज रहे,जब हृदय देश क्यों दुःख लेश। और इसीलिये बाबा भी स्मरण कराते हैं-
अस प्रभु अछत हृदय अविकारी।
सकल लोक जन दीन दुखारी।। अतः
तजि शोक धाम।
विश्राम राम।
सब सिद्ध काम।
कह राम राम।

हमारे अंशी वे भगवान् जब, चेतन ,निर्मल और सहज स्वाभाविक नित्य प्रकर्ष हर्ष सुख की राशि हैं, तब उन्हीं के अंशभूत हम जीव भी,आनंद राशि ही हैं।
जब परम श्रद्धा-विश्वास में विश्वास भरोसा है, तब हृदय में हर्ष ही रहेगा, दीनता (दुखरूपता) आ ही नहीं सकती।

शास्त्रों में भी हम इसके लिए दृढ़ प्रतिज्ञ होकर निवेदन करते हैं, कि एक मनुष्य की पूर्णायु शतायुष्य पर्यन्त कोई दीनता दरिद्रता न हो-
शतम् अदीनाः स्याम शरदः शतम्।

नवम सरल सब सन छल हीना।
तो ऐसा समझें कि स-सीता, र-राम और ल- लक्ष्मण(सरल), जब मनोमन्दिर में आ विराजे हैं,तो कैसे कपट(छल) छू पायेगा।
श्रीरामनाम जप स्मरण करते-करते ये सभी साधन स्वतः उपलब्ध होंगे।
भगवान् ने तो भक्ति का लक्षण ही दे दिया है-सरल स्वभाव, निष्कपट(निर्मल)
मन,यथालाभ सन्तोष,दयावान् होना-
कहहु भगति पथ कवन प्रयासा।
जोग न जप तप मख उपवासा।।
सरल स्वभाव न मन कुटिलाई।
यथालाभ सन्तोष सदाई।।
मेरे चित चढ़ि नव-नवा भगति।
नहिं होइ अगति सब भाँति प्रगति।।

श्रीसन्त संग, हरि-कथा रंग।
निर्मान गुरूपद -कमल प्रेम।
निष्कपट होइ हरि जनन गान।
विश्वास राम-जप भजन मान।
इन्द्रिय निग्रह हित विरत राग।
सुन्दर स्वभाव धर्मानुराग।।
सम्पूर्ण जगत ईश्वर वितान।
सब सन्त प्रभू ते अधिक जान।
प्रारब्ध प्राप्त सन्तोष धार ।
परदोस स्वप्न दर्शन न धार।
निश्छल स्वभाव श्रीकृष्ण आस।
हिय हरष दीन नहिं आस पास।

प्रेमियों! ऐसी साधन भक्ति में से कोई भी एक मिले ,तो शरणागति भक्ति मिले।
और ऐसी भक्ति का भाजन बन जाने वाली शबरी तो धन्यातिधन्य है ही,हम भी भगवान् और भक्त का स्मरण कर धन्य हो रहे हैं –
राम भजत बिटिया भली,
राम बिमुख नहिं पूत।।
शबरी तो बैकुण्ठ गई।
धुन्धुकारि भयो भूत।।

अब प्रभु कृपा से प्रभु स्मरण करते हुए,
प्रभु चरण शरण ग्रहण।

।। हरिः शरणम् ।।

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Author: Prof. Shishir Chandra Upadhyay

I am Professor of Sanskrit subject in K.B.P.G College, Mirzapur, Uttar Pradesh, India, since 1991.

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