आठवीं भक्ति नदी भगवद् मुख से मुखरित होती है।
केवल शरीर से ही नहीं, बल्कि तत्वतः मनुष्य बनने और पुनरपि जननं पुनरपि मरणम् ,पुनरपि जननीजठरेशयनम् ,को रोककर ,सुखी मीन जहँ नीर अगाधा,
जिमि हरिशरण न एकौ बाधा वाली भक्ति और परम आत्यंतिक सुखप्राप्ति के लिये, यथा लाभ सन्तोष अनिवार्य है।इसलिये-
तुल्यनिन्दास्तुतिः मौनी ,
सन्तुष्टः येन केनचित्।
अनिकेतः स्थिरमतिः ,
भक्तिमान् यो स मे प्रियः।12/19 गीता
लीलापुरुषोत्तम ने निन्दा या स्तुति होने पर भक्त को समान भावस्थ रहने वाला कहा। आखिर ऐसी समान अवस्था किसी भक्त में उपजी कैसे? सन्तोष कैसे हुआ?
इसलिये कि उसकी ज्ञानेन्द्रियों, कर्मेन्द्रियों को छोड़िये ,जब अन्तःकरण यानि कि मन, बुद्धि, चित्त
और अहंकार ही संसार में नहीं होता तब
मानिये कि वह स्वरूपतः इन चतुरिन्द्रियों को भी भगवान् में लगा दिया है,जिससे संसार और विषयों से विरत होकर, वह भगवद् रत ही
हो जाता है।तब समस्त जगत् ,वासुदेवः
सर्वम् ,प्रतीत होने से सभी वस्तु,व्यक्ति, पदार्थ, देश,काल में भगवान् ही अनुभव में आते हैं।
अतः उसके ऊपर निन्दा और स्तुति का प्रभाव नहीं होता, क्यों कि वह भावग्राही जनार्दनः के भाव में जो आ गया। मैं और मैं पन मिटने से भगवद् बोध ही होता है, और किसी का ज्ञान ही नहीं रहता।तभी परम सन्तोष आता है- और-
जब मैं था तब हरि नहीं ,
अब हरि हैं मैं नाहिं की दशा हो जाती है।
अनिकेतः अर्थात् उसकी वासना गृहस्थ, वानप्रस्थ और सन्यस्त आदि अवस्थाओं में किसी भी घर या कुटीर में नहीं रह जाती संसारोच्छेद होने से गृहादि के प्रतिकोई अनुराग नहीं रहता।अब एकमात्र
“अचल “भगवान् में निश्चल बुद्धि हो जाने से ,भक्त को स्थिर -मतिः कहा।
क्योंकि भगवदनुरक्ति से सन्तोष गुण आ ही जाने से, यथालाभ सन्तोषः स्वतः सिद्ध।
इसीलिये बाबा ने कहा कि बिना सन्तोष के कामनाओं का नाश नहीं होगा।सुख तो दिवा स्वप्न ही है।भगवद् भजन या भगवान् के -नाम,रूप,लीला,गुण सेवन के बिना कामना जायेगी नहीं।और चले जाने से फिर आयेगी कैसे, क्योंकि शरणागत रक्षक और वात्सल्यगुण सागर भगवान् जो आश्रय बन गये।बाबा यही भाव “मानस”में मनन करते हैं-
बिनु सन्तोष न काम नसाहीं।
काम अछत सुख सपनेहुँ नाहीं।।
रामभजन बिनु मिटहिं कि कामा।
थल बिहीन तरु कबहुँ कि जामा।।
कोउ विश्राम कि पाव,तात सहज सन्तोष बिनु। चलै कि जल बिनु नाव ,कोटि जतन पचि-पचि मरिअ।।
“उसकी “अनुभूति “वही “जान सकता है
दूसरा कौन जाने भैया!
बाबा ने बरबस परवश उसकी दशा का वर्णन किया-
मम गुन ग्राम नाम रत,
गत ममता मद मोह।
ता कर सुख सोइ जानै,
परानन्द सन्दोह ।।
निश्चित रूप से सन्तोषी भक्त का काम भगवान् ही बन जाते हैं।परिजन पुरजन मान बड़ाई में,उसकी वृत्ति रहती नहीं।
वह तो वस्तुतः अकाम है।
संसार के प्रति उसकी कोई क्रिया होती नहीं, जो -जो करता है, वह तो परम काम के प्रति आकृष्ट चित्त है-
अकामस्य क्रिया काचित्,
दृश्यते नेह कर्हिचित् ।
यद् यद् हि कुरुते किञ्चित् ,
तत् तत् ” कामस्य ” चेष्टितम्।।
अब आठवीं भक्ति का दूसरा भाग है कि
स्वप्न में भी परदोष न देखना।
जब संसार राग वासुदेवः सर्वम् से मिट गया, तब दोष कैसे?
कोई निन्दनीय दोषी दिखेगा ही नहीं।
और यदि संसार भाव है और उसे हटाना चाहते हैं, तब भी दोषदर्शन जैसे अपराध से बचना ही होगा। इसीलिये बाबा ने कुछ छोड़ा नहीं और ऐसा करने वालों को सावधान किया-
परम धर्म श्रुति बिदित अहिंसा।
पर निन्दा सम अघ न गरीसा।
हर गुरु निन्दक दादुर होई।
जन्म सहस्र पाव तन सोई।।
सब के निन्दा जे जड़ करहीं।।
ते चमगादुर होइ अवतरहीं।।
और वस्तुतः दूसरे के दोष से विरत होने के लिए इसलिए कहा कि, दोषी के दोष, दोष द्रष्टा के मन में उतर कर उसे भी दोषपूर्ण कर देते हैं। दोषी का पाप तो कम होता है, लेकिन दोषी के तत् तत् दोष ,दोषद्रष्टा को भी भोगने पड़ जाते हैं।
इस तरह साधन भक्ति के निर्देश क्रम में आठवीं भक्ति की पूर्ति में श्रीसीतारामचन्द्र
भगवान् ने कहा-
आठम यथा लाभ सन्तोषा।
सपनेहुँ नहिं देखै परदोषा।।
।। हरिः शरणम् ।।