चौथि भगति मम गुनगन करै कपट तजि गान ।

साधन भक्ति के रूप में प्रभु ने स्वयं अपने (श्रीभगवान् के) गुणों को गाने के लिए निर्देश दिया, और वह भी कपट छोड़कर।
अब कपट क्या? कुत्सितः पटः कपटः
माने कि खराब विचारों का वस्त्र त्याग कर। ये खराब विचार हैं, विषयाभिरुचि।
यह ममता अहन्ता ग्रस्तता ही ,वह आवरण(वस्त्र पट) है, जिससे संसार कुछ का कुछ दीखता है। तो यदि साधु गुरु संग का संयोग मिला है, और यदि यह संसार परिवर्तन शीलता के कारण जैसा है, वैसा नहीं दीखता है, तो गुरु वचनों पर श्रद्धा रखते हुएभगवन् नाम लीला गुण धाम का तत् प्रतिपादित रीति से,गान करना होगा।
भक्तिरसामृतसिन्धुकार ने उच्चैः भाषा तु कीर्तनम् ,कहकर जोर -जोर से नामलीला को गाने पर जोर दिया है।शुकभगवान् ने भी कहा कि, सतयुग में ध्यान, त्रेता में यज्ञ,द्वापर में पूजा सपर्या से जो भगवत् प्राप्ति है, वह तो कलियुग में हरिगुन कीर्तन से सहज प्राप्त है-
कृते यद् ध्यायतो विष्णुं, त्रेतायां यजतः मखैः।द्वापरे परिचर्यायां कलौ तद् हरिकीर्तनाद्।।12/3/52
बाबा ने भी यही कहा-
कलियुग सम युग आन नहिं,
जो नर कर विश्वास। गाइ राम गुन बिमल भवतर बिनहिं प्रयास।।
कलियुग केवल हरिगुन गाहा।
गावत नर पावै भव थाहा।।
एहि कलिकाल न साधन दूजा।
जोग जग्य जप तप ब्रत पूजा।
रामहिं सुमिरिअ गाइअ रामहिं।
सन्तत सुनिअ रामगुन ग्रामहिं।।
और इस तरह गीता में अर्जुन भी यही भाव व्यक्त करते हैं-
स्थाने हृषिकेश तव प्रकीर्त्या जगत् प्रहृष्यति अनुरज्यते च।रक्षांसि भूतानि दिशो द्रवन्ति,सर्वे नमस्यन्ति च सिद्धसङ्घाः।।11/36
और भगवान् तो आनन्दसिन्धु,सुख के एक मात्र आश्रय हैं, जिनके कण मात्र आनंद से अनन्तान्त ब्रह्माण्ड सुखी तथा पालितपोषित है। वे तो धर्म की धुरी,धैर्य तथा नीति,रीति,प्रीति के पोषक हैं।सत्य, स्नेह शील के समुद्र हैं-

जो आनन्द सिन्धु सुखराशी, सीकर ते त्रैलोक सुपासी।सो सुखधाम राम अस नामा।अखिल लोकदायक विश्रामा।।
धरम धुरीन धीर नय सागर।सत्य सनेह शील सुख सागर।।
तो इस तरह के भगवान् से भक्ति कामी की प्रार्थना होगी ही-
सन्त सन्तापहर,विश्वविश्रामकर,राम कामारि,अभिरामकारी।शुद्ध बोधायतन,
सच्चिदानन्दघन,सज्जनानन्दवर्धन,
खरारी।। देहि सतसंग निज अंग श्रीरंग!
भवभंग-कारण शरणशोकहारी। ये तु भव -दंघ्रि पल्लवसमाश्रित सदा,भक्तिरत, विगतसंशय, मुरारी।।
और इस प्रकार आपकी भक्ति तो दैहिक दैविक,भौतिक तापों की परमौषधि है। चराचर में आपको ही देखनेवाले सन्त ही वैद्य हैं। वस्तुतः सन्त और भगवान् में कोई अन्तर नहीं-
प्रबलभवजनित त्रैव्याधि-भैषज भगति, भक्त भैषज्यमद्वैतदरसी।
सन्त भगवन्त अन्तर निरन्तर नहीं, किमपि मतिमलिन कह दासतुलसी।
ऐसी विनयवाणी बोलने वाले तुलसी का आश्रय लेकर, भगवान् के गुणगणों का निष्कपट भाव से गान करना चाहिए।क्योंकि वह सन्तसद्गुरु तो जीवन में इसीलिये मिले ही हैं कि अज्ञान मिटे-
आते न जो परमेश वे गुरुदेव के अवतार में, रहता अँधेरा ही अँधेरा मोह का संसार में। इस तरह की विवेकपूर्ण चित्त की स्थिति हो जाने पर भगवान् ने भक्ति का चतुर्थ साधन कहा-

चौथि भगति मम गुनगन करै कपट तजि गान ।

।। हरिः शरणम् ।।

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Author: Prof. Shishir Chandra Upadhyay

I am Professor of Sanskrit subject in K.B.P.G College, Mirzapur, Uttar Pradesh, India, since 1991.

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