जब भगवान् के प्राणप्यारे भक्तों का संग मिल जायगा, तब उन्हीं के अनुग्रह से प्रभु कथा श्रवण में भी चित्तवृत्ति जागृत् होगी।और निरंतर परिवर्तन शील जगत् एवं शरीर में भी वृत्ति हटने लगेगी।
धन्य हैं ऐसे शुकशनकादि व्यासनारदादि नित्य मुक्त सन्त ,जिनमें किसी भाग्यशाली की चित्तवृत्ति आवृत्त हो जाय।
प.पू. हमारे गुरुदेवश्री मलूकपीठाधीश महाराज ने एक ऐसी स्वयं प्रत्यक्ष कृत घटना का उल्लेख किया, जिसे स्मरण कर ,हृदय गद्गद हो जाता है।
उन्होंने एक ऐसे सन्त सद्गुरु के सान्निध्य का वर्णन किया जिनके पद पंकज सेवा का महान् सौलभ्य, उन्हें मिला। वे सिद्ध सन्त सद् गुरु थे,परम पूज्य शरणानन्दजी महाराज।
अपने महाराज जी तो बारह चौदह वर्ष की अवस्था से ही श्रीशरणानन्द महाराज की सपर्या में अनुरक्त थे। एक सज्जन अपने पाँच वर्षीय पुत्र के साथ श्रद्धेय शरणानन्दजी के दर्शनार्थ पधारे। गुरुदेव तो, दस पन्द्रह फीट दूर से ही निर्धारित समय तक दर्शन देते थे। उनकी दृष्टि हमेशा नीची ही रहती थी।जब बालक के पिता ने सद्गुरु को प्रणाम करने को कह ,तब बालक ने सामने बैठे हुए ही दोनों हाथ जोड़कर प्रणाम किया। सद् गुरु भगवान् अपनी नीची निगाह उपर करके, उस बालक को देख भर लिया, और पंच वर्षीय बालक तत्काल समाधि दशा में चला गया। लोग परेशान हुए, लेकिन महाराज जी ने कहा कि पूर्व शरीर से इसे किन्हीं श्रीगुरु का पदपंकज मिला था,अतः इसकी चित्तवृत्ति निर्मल है।
इसे पूजा उपासना में विनियोजित करो,इसका और इसके साथ अन्य लोगों का भी लाभ होगा।
वस्तुत भगवान् ही गुरु रूप में आकर शिष्यों का आत्यंतिक दुख दूर करते हैं।
यह गुरु भक्ति ही हरिभक्ति है।और जब भगवान् स्वयं अमानी हैं, तो तद् रूप श्रीगुरु भी अमानी हैं, फोटोस्टेट जो ठहरे।
आदि शङ्कर ने इसीलिये संसार की सभी भोगसामग्री होने पर भी, गुरु चरणों में अनुरक्ति न होने पर आश्चर्य व्यक्त किया-
शरीरं सुरूपं तथा वा कलत्रं ,
यशः चारुचित्रं धनं मेरुतुल्यम्।
मनः चेन् न लग्नं गुरोः अङ्घ्रिपद्मे,
ततःकिं ततःकिं ततःकिं ततः किम्।।
और बाबा ने तो मानस के आरम्भ में ही अमानी सद्गुरु के चरणकमलों की नखमणि प्रभा के स्मरण मात्रसे संसार को देखने के नजरिये में ही बदलाव का अनुभूत वर्णन किया है-
बन्दौ गुरुपदपदुमपरागा।
सुरुचि सुवास सरस अनुरागा
अमियमूरिमय चूरन चारू।
समन सकल भवरुज परिवारू।।
श्रीगुरुपदनखमनिगन जोती।
सुमिरत दिव्य दृष्टि हिय होती।।
यह मोहान्धकार को नष्टकर, हृदय को प्रकाशित करनेवाले हैं, जिसे भाग्यशाली भक्त ही पा पाते हैं-
दलन मोहतम सो सप्रकासू।
बड़े भाग उर आवै जासू।।
आँखें खुल जाती हैं, निर्मल हो जाती हैं और ब्रह्माण्ड का रहस्य भेदन हो जाता है, क्योंकि देनेवाले श्रीहरिगुरु – दिव्यं ददामि ते चक्षुः ,पश्य मे योगमैश्वरम् ,जो हैं-
उघरहिं विमल विलोचन ही के।
मिटहिं दोसदुख भव रजनी के।
सूझहिं रामचरित मनि मानिक।
गुपुत प्रकट जहँ जो जेहिं खानिक।।
श्रीगुरु रूप में श्रीहरि के वन्दनीय चरण कमल हैं, जिनकी वाणी महा अज्ञान के
समूह को छिन्न करनेवाली सूर्यप्रभा है-
बन्दौ गुरुपदकंज,कृपासिन्धु नररूपहरि।
महामोहतमपुंज,जासु बचन रविकरनिकर।
और इस तरह सन्त सद्गुरु को सृजन पालन संहारकर्ता त्रितयी कहकर, उनकी भक्ति को सर्वोच्च सिद्ध किया गया है, जो अमानी होकर ,दूसरों को मान देने वाले हैं- गुरुः ब्रह्मा गुरुः विष्णुः,गुरुः देवः महेश्वरः, गुरुः साक्षात् परब्रह्म, तस्मै श्रीगुरवे नमः।। ।अमानी मानदो मान्यः
लोकस्वामी त्रिलोकधृत्।सुमेधा मेधजः धन्यः सत्यमेधा धराधरः।।
श्रीगुरु रूप ही अवतरित हरि की सन्निधि ऐसी दशा कर देती है कि हम अर्जुन की तरह होने लगते हैं, मानापमानयोः तुल्यः तुल्यः मित्रारिपक्षयोः।
और इस तरह शबरी को प्रदत्त वह तीसरी भक्ति की साधना पूरी होती दीखती है,जहाँ गुरु और तत् शिष्य एकाकार होते हैं-
सनमान निरादर आदरही।
सब सन्त सुखी विचरन्ति मही।।
और ऐसी निर्मल चित्त की दशा में ही वह तृतीया भगवत् प्रदत्ता भक्ति मूर्तिमती हो जाती है, जब भगवान् कहते हैं-
गुरुपदपंकजसेवा तीसरि भगति अमानि।
।। हरिः शरणम् ।।