प्रथम भगति सन्तन कर संगा

भील जाति जाता भक्तिमती शबरी श्रीरामकथा की अन्यतम पात्र है। जंगली जन जाति में उत्पन्न भगवत् परायणा शबरी को भगवान् स्वयं आकर साधन भक्ति का उपदेश देते हैं। जब भगवान् श्रीराम पैदा नहीं हुए थे, उसके पहले ही भगवन् नाम का उपदेश ,मतंग ऋषि ने करुणा कृपा करके उसे प्रदान कर दिया था।और कहा था कि,प्रतीक्षा करो प्रभु अवश्य पधारकर तुम्हें कृतकृत्य करेंगे।
एक ऐसे ऋषि मतंग जो ,तप,ब्रह्मचर्य, शम,दम ,त्याग, सत्यशुचिता,यमनियम की साक्षात् प्रतिमूर्ति थे।उनका कथन अव्यर्थ था –
मृषा न होइ देव ऋषि बानी।
हमारे सद्गुरु मलूकपीठाधीश पुराणप्रसिद्ध सिद्ध बातें कहने में स्वभावतः सिद्ध हैं। वे बताते हैं कि, सन्त दर्शन का फल भगवान् दर्शन और भगवान् के भी दर्शन का फल सन्त दर्शन है।
जौं रघुबीर अनुग्रह कीना
तौ तुम मोहि दरस हठि दीना।
अब मोहिं भा भरोस हनुमन्ता
बिनु हरि कृपा मिलहिं नहिं सन्ता।।
भगवान् कृपा करते हैं, तब सन्त बरबस आकर दर्शन देते हैं। और जब सन्त कृपा होती है, तब भगवान् भी अपने भक्त सन्त की वाणी सत्य करने के लिए स्वयं साक्षात् दर्शन देते हैं।
प्रयागराज में राजित भरद्वाज ऋषि ने भगवान् श्रीराम का दर्शन पाकर, उनके दर्शन का भी फल ऋषि दर्शन बताया था,जिसके फलस्वरूप उन्हें महामुनीन्द्र याज्ञवल्क्य का दर्शन हुआ था।
बड़े सौभाग्य से सत्याग्रही सन्तो का संग सुलभ होता है और निष्प्रयास संसारोच्छेद हुए बिना नहीं रहता-
बड़े भाग पाइअ सतसंगा।
बिनहिं प्रयास होइ भवभंगा।।
मनवाणीकर्म से परम परम उपकारी सन्त सहज ही कृपालु होते हैं-
पर उपकार बचन मन काया।
सन्त सुभाव सहज खगराया।
और जब सन्त मिलते हैं, तब सब जैसे सर्वस्व सुख ही मूर्तिमान मिल जाता है-
नहिं दरिद्र सम जग दुख माहीं
सन्त मिलन सम सुख जग नाहीं।।
बिना सत्संग के कौन सी भक्ति होगी? वात्सल्यगुण सागर भगवान् द्रवित हों ,वे तब द्रवित हों जब ,हम संसार चक्र के भ्रमजाल में स्वयं दुखी होकर आर्तनाद करें।
पाहि मुरारे! कृपयावारे!
और
बिनु सतसंग बिवेक न होई।
राम कृपा बिनु सुलभ न सोई
वस्तुतः जब हमें आत्मोद्धार की छटपटाहट छापेगी, तब परमात्मा कृपा करेंगे, सन्तों की छापेमारी होगी।जिनके दर्शन परसन से पापराशि विशीर्ण होकर सत्याग्नि में भस्म हो जायेगी-
विनय पत्रिका (चिट्ठी पाती)
भी यही बोलती है-
बिनु सतसंग भगति नहिं होई
ते तब मिलैं द्रवैं जब सोई।
जब द्रवैं दीन दयाल राघव
साधु संगति पाइये।
जेहि दरस परस समागमादिक पापरासि नसाइये।
और निःसन्देह ,परदुखदुखी सन्त सुपुनीता का संग मिलने का काम भाव जागृत हो जाय तो , संसार भाव से अधोगति कराने वाला विषयी यह काम भी कृतार्थ होकर तार देगा।
और इसीलिये मतंग ऋषि की कृपाभाजन दीन हीन शबरी कृपालु श्रीराम की कृपा पात्र बन जाती है।
भगवान् ने करुणा करके भक्ति की प्राप्ति के लिए शबरी को माध्यम बना कर सभी जीवों को साधन के नौ सूत्र बताये हैं। इन्हीं में से पहली साधन भक्ति साधु सन्तों का संग है ,जो अकेले ही अनेक जन्मों की बिगड़ी बनाने में सामर्थ्य शील है-

प्रथम भगति सन्तन कर संगा

।। हरिः शरणम् ।।

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Author: Prof. Shishir Chandra Upadhyay

I am Professor of Sanskrit subject in K.B.P.G College, Mirzapur, Uttar Pradesh, India, since 1991.

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