तुलसी तजि कुसमाजु

संसार वासना या तृष्णा के त्याग की समानता में संसार का कोई सुख नहीं। इस जीवन में कामोपभोग का सुख और अन्यान्य दिव्य वस्तु व्यक्ति पदार्थों की प्राप्ति का सुख ,किसी भी दशा में वासना त्याग सुख के सोलहवें अंश के भी बराबर नहीं हो सकता।

 तात्पर्य ये कि, सोलहवाँ भाग तो उपलक्षण मात्र है।वस्तुतः काभोपभोग हेतु ,जब यह मानव जन्म ही नहीं मिला,है  तब  वासना त्याग सुख ही सर्वोपरि आनन्द की सीमा का स्पर्श करता है,जिसके बाद परम सुख शान्ति का अनुभव होता है। 

इसीलिये भगवान्  ने कहा-

त्यागात् शान्तिः अनन्तरम् 

वेद भी कहते हैं- त्यागेन एकेन अमृतत्वम् आनशुः ।

मतलब कि विषयों से , भोग त्याग से ही अमरता प्राप्य है।

 अब सोचिये, हम मन्दिर जाते इसलिये हैं कि, हमको संसार का कोई वस्तु व्यक्ति पद पदार्थ अभिलषित है।

 हम कैसे दुर्बुद्धि हैं कि उस ,असीम की पूजा उपासना के फलस्वरूप संसार की ससीम वस्तु चाहते हैं। क्या उस कण-कण में व्याप्त परमात्मा से कोई बात छिपी हो सकती है? 

 हमारा परम हित किसे पाकर  होगा, यह उन सर्वव्यापी को अभिज्ञात है।

अतः उत्तम पक्ष तो यही है कि, जेहि विधि नाथ! होइ हित मोरा। करौं सो बेगि दास मैं तोरा।

 और इसलिये विगतविषयतृष्णः कृष्णमाराधयामि ही वरेण्य पक्ष है,  जिसे नचिकेता, प्रह्लाद और ध्रुव जैसे भक्त धारण करके हमारी धारणा को बदल चुके हैं। 

 परमहंस रामकृष्ण देव ने कहा था कि जब भगवान् के हरि कृष्ण नारायण नामों का उच्चारण-स्मरण करते -करते  गला भर आवे ,तब समझो कि , भगवद् प्राप्ति और संसृति चक्र से मुक्त होने के मार्ग पर हम चल पड़े हैं।

 और सन्तों एवं भक्तों ने भी 

एतदालम्बनं श्रेष्ठं एतदालम्बनं परम् ,कहकर मानव को श्रेष्ठतम मार्ग सुझाया है।

 कलिपावनावतार बाबा तुलसी ने तो और भी आगे जाकर अपनी अनुभूति को अत्यंत अकिंचन भाव से कहकर  व्यक्त किया है।

 वह भगवद् विमुख जीव की नाना जन्मों से संसारोन्मुख दशा दिशा को क्षण मात्र में बदल कर सन्मुख होइ जीव मोहिं जबहीं ।जन्म कोटि अघ नासौं तबहीं ,ऐसा संकल्प भगवान् से कराकर सब बदल कर ,दूसरी कुण्डली ही लिखवा देते हैं।

  लेकिन एक शर्त भी  रखी है कि, कुसंग तो छोड़ना ही पड़ेगा।भगवान् ऋषभदेव तो स्त्री संग ही नहीं, वरन् स्त्री आसंग के संगी जनों के संग का भी परित्याग का निर्देश दिया है- त्यज योषितां संङ्गि-सङ्गम्।

 और बाबा तो बड़ी सहजता से, सरलता से कठिन संसार को पार करने का सुगम मार्ग बताते हुए क्षणभर में सर्वार्थ सिद्धि ही  देते दीखते हैं-

बिगड़ी जनम अनेक की 

अब ही सुधरै  आजु।

होहि राम को नाम जप

तुलसी तजि कुसमाजु।।

।। हरिः शरणम् ।।

Unknown's avatar

Author: Prof. Shishir Chandra Upadhyay

I am Professor of Sanskrit subject in K.B.P.G College, Mirzapur, Uttar Pradesh, India, since 1991.

Leave a comment