जिस भगवती की अहैतुकी कृपा से श्रीधामविन्ध्याचल में निवास का निरतिशय सुख मिला हुआ है, और शरीर भी यहीं जन्मा है, उनके प्रति सतत चरणशरण की कामना बनी रहती है।
उनकी ही कृपालेश से वह सुखानुभूति भी होती रहती, जिन्होंने ” सेवक” को रोजीरोटी के लिए अपना चरण नहीं छुड़ाया।
अस्तु, यहाँ धाम में बसने के कारण नाना जागतिक शरीर सम्बन्धसम्बन्धी भी इसी धाम से हैं। अभी पिछले दिनों ऐसे ही एक सम्बन्धी और मेरे मित्र ,जो प्रायः भारत भर के विभिन्न तीर्थों में जाते रहते हैं, एक यात्रा क्रम में, टिप्पणी की। उन्होंने लिखा ,न किसी भी अभाव में जिओ, ना किसी के प्रभाव में जिओ ,जिओ तो केवल अपने स्वभाव में जिओ।
मिलने पर मैंने पूछा , इस अभाव,प्रभाव और स्वभाव का भाव क्या है?
बहुत देर तक सोचकर उन्होंने कहा – मैं स्वतन्त्र जीवन जीना चाहता हूँ, यही ,उन पंक्तियों का अर्थ है।
मैने कह स्वतन्त्र का आपका आशय स्वछन्दता से है और उन्होंने स्वीकार भी किया।
हमने कहा आप अपने शत्रु हैं या मित्र। यह शरीर तो पूर्व कृत कर्मों के बन्धन के कारण मिला है।और अब किसी माता के गर्भ में न जाना पड़े ,यही इस मानव शरीर का सर्वस्व लक्ष्य है। और इस लक्ष्य को पाने के लिए भगवान् ,उनके द्वारा निःसृत वेदवाणी, पुराण ,स्मृति, और व्यास,वाल्मीकि, तुलसी आदि के द्वारा निर्धारित नियमों का बन्धन तो मानना ही पड़ेगा। क्योंकि शास्त्र हमारे जैसे मलिन जीवों को मर्यादा सिखाते हैं, जिस मर्यादा के बन्धन में बँध कर ,हम अपने को जान पाते हैं, कि हम हैं कौन?
बिना अपने को जाने इस शरीर संसार क कोई रहस्य नहीं खुलेगा। त्यों त्यों उरझत जात ,की स्थिति आपकी है।
स्वतंत्र केवल और केवल परमात्मा ही हैं-
स्वतन्त्रः कर्ता यदि आप अपने को सन्त शास्त्र के बन्धन में नहीं रखते तो ,आप अपने शत्रु स्वयं हैं।
बन्धुः आत्मा आत्मनः तस्य
येन आत्मैव आत्मना जितः।
अनात्मनः तु शत्रुत्वे ,
वर्तेताम् आत्मैव शत्रुवत्।
अतः लखचौरासी से छूटना है ,तो सन्तशास्त्र और भगवान् के चरणोंकी रज (धूलि) में और उनके बन्धन में रहना होगा, स्वतंत्र स्वच्छंद कभी नहीं। तुलसी का लास्य लेश भी प्रवेश कर गया, तो बिगड़ी बन जायेगी-
अब लौं नसानी अब न नसैहौं
मनमधुकर पनकै तुलसी
रघुपतिपदकमल बसैहौं।
।। हरिः शरणम् ।।