जगदाधार, सर्वकारणकारण,अनन्तानन्त ब्रह्माण्ड नायक,सर्वेश्वर,परात् पर परमात्मा सर्वत्र विराजे हैं।
हम अपने अखण्ड पाखण्ड के पोषक, बाहरी आडम्बर के प्रदर्शक, स्वयं अपने में हरिः ओ3म् तत् सत् की अनुभूति नहीं कर पा रहे हैं,तो इससे बड़ा आश्चर्य क्या है?
हृदय में आशा है संसार के धन,सम्पत्ति, मान, बड़ाई की। हम संसार के वैभव को अपना मानने की भूल कीये बैठे हैं।
पददास, प्रतिष्ठा दास,मानदास,सम्मान दास,रूपया दास,बडा़ई दास,
कामदास, मोहदास, क्रोधदास बने हैं, क्योंकि जन्म-जन्म का अमिट मलिन संस्कार जो है।
कुछ पूजा पाठ कर भी लेते हैं, तो दम्भ बढ़ जाता है।
अपनी किसी पूजा में अपने अन्तर में विराजित हृद्देश में सदा प्रतिष्ठित परमात्मा का अनुभव नहीं होता।
कुछ करते भी हैं तो संसार को जनाने रिझाने के लिये ।
अन्तरगत यदि भासता तो कहि-कहि काहि जनाव।
अन्तरजामी जानता अन्तर गत के भाव।।
प्रभु जानत सब बिनहिं जनाए। कहहु कवन सिधि लोक रिझाए।।
हम बड़े विद्वान और ज्ञानी मानते हैं, अपने को ,वेद शास्त्र की सम्यक् व्याख्या भी कर लेते हैं तो क्या हुआ?
इससे तो अपना पेट पाल सकते हैं, स्वर्गादि का वैभव और इन्द्रादि का पद भी पा सकते हैं, लेकिन करुणानिधान की करुणा से मिली इस देह को पुनः जन्म में ही ले जा रहे हैं-
श्रीमदाद्य भगवान् शङ्कर ने अपने “विवेकचूडामणि” में यही विवेक व्यक्त किया-
वाग् वैखरी शब्दझरी शास्त्र-
व्याख्यान-कौशलम्।
वैदुष्यं विदुषां तद्वद्
भुक्तये न तु मुक्तये।।
इसलिए –
मन क्रम बचन छाँड़ि चतुराई।
भजत कृपा करिहहिं रघुराई।
पहले स्वयं में आत्मानुभूति करनी होगी तब अपने से इतर सभी में उस प्रभा का
आभास होने लगेगा।
।। हरिः शरणम् ।।