नाम की फेंट कसी है

नाना जन्मों का अज्ञान जनित  देह और गेह की आसक्ति आसानी से जाती नहीं प्रभु!

 हरेः हरेः नाम हरेः नाम

हरेः नामैव केवलम्।

 कलौ नास्त्येव नास्त्येव

नास्त्येव गतिः अन्यथा।

कलि युग केवल हरी गुन गाहा। सुमिरि सुमिरि पावत भव थाहा।।

भगवान् वेदव्यास और हमारे आर्ष एवं प्राचीनतम परम्परा के संवाहक वेदादि शास्त्रों में परा प्रज्ञा से विकसित दृष्टि ने बड़ी सूक्ष्म बात कही है।

   जब भगवान् की करुणा कृपा से मनुष्य जन्म प्राप्त होता है, तब गर्भ गत जीव भगवान् से आर्त भावापन्न होकर प्रार्थना करता है।

  प्रार्थना इसलिये कि गर्भावस्था में जीवात्मा को सैकडों पूर्व -शूकर-कूकर से लेकर इन्द्रादि शरीर के भोगों की स्मृति रहती है।और इसीलिये वह ,जीव कातर होकर प्रभु से कहता कि, एक बार और मुझे मानव जन्म मिल जाय,मैं मातृगर्भ से निकल कर बाहर आ जाउँ , तो ऐसा कोई काम नहीं करुँगा , जिससे कोई भी भोग शरीर मिले।

 मैं आपके शरणागत हूँ।

मैं केवल भजन कीर्तन नाम जपादि ही करूँगा ।

यद् योन्यां प्रमुच्येहम्…।

अब जनि (जन्म) जाउँ 

भजहु चक्रपानी।

    विनयपत्रिका।

इत्यादि वचनों से संसार की भयावहता से व्यथित वह, पूर्व जन्मों शरीरों का स्मरण कर ,प्रार्थना करते हुए नाम जपादि द्वारा मुक्त होने का संकल्प व्यक्त करता है।

 गर्भ वास पूर्ण कर बाहर आते ही भगवान् की प्रचण्ड माया घेर लेती है। सभी पूर्व पराकृत स्मरण, भगवान् स्वयं भुलवा देते हैं, क्योंकि यदि स्मृति बनी रहे तो ,वह पागल हो जाय। 

  और सद्गूरु कृपा से निवेदन के भाव छलक पड़ते हैं, कल्याण भी हो ही जाता है।

अपराधसहस्रभाजनं

पतितं भीमभवार्णवोदरे।

अगतिं शरणागतिं हरे!

कृपया केवलं आत्मसात् कुरु।

बाबा मलूक की वाणी में उसकी प्रार्थना होती है-

दीनदयाल सुनी जब तें

तब ते मन में कछु ऐसी बसी है। तेरो कहाय के जाऊँ कहाँ,

अरु तेरे ही नाम की फेंट कसी है। तेरो ही आसरो एक 

मलूक को, तेरे समान न दूजो जसी है।ऐ हो मुरारि! पुकारि कहूँ या में मेरी हँसी नाहिं 

तेरी हँसी है।।

।। हरिः शरणम् ।।

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Author: Prof. Shishir Chandra Upadhyay

I am Professor of Sanskrit subject in K.B.P.G College, Mirzapur, Uttar Pradesh, India, since 1991.

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