इस शरीर संसार में अहन्ता और ममता ही नाना क्लेशों और पाप ताप सन्ताप की जड़ है।शब्दस्पर्शादि विभिन्न विषयों में जन्म जन्मांतर से आबद्ध मनबुद्धि की शुद्धि जल्दी होती नहीं है। यह संसार या प्रकृति भिन्नाप्रकृतिरष्टधा इत्यादि भगवद् वचनों से आठ संख्या में है। इसमें पाँच स्थूल है, और तीन सूक्ष्म। पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश स्थूल प्रकृति है।
जबकि मन,बुद्धि और अहंकार, ये तीन सूक्ष्म के अन्तर्गत आते हैं।
यह शरीर और संसार इन्हीं से निर्मित है।शरीर और संसार दो नहीं, बल्कि एक ही हैं।जो इस घटाकाश शरीर पिण्ड में है, वही अनन्त अण्ड-ब्रह्माण्ड में भी।
क्षितिजलपावकगगनशरीरा
पंचरचित यह अधम शरीरा।
अब इन आठों प्रकृतियों में सबसे पहले विकार की उत्पत्ति मन,बुद्धि, अहंकार में होती है।और पुनः तदनन्तर पृथ्वी आदि में।यदि सद्गुरु सन्त भगवन्त कृपा का आश्रय मिले, तो ही इस सूक्ष्म अहमादि की विकृति दूर हो सकती है।
हम जैसे मलिन अन्तःकरण के जीवों को पहले स्वयं आगे शास्त्रानुमोदित सन्मार्ग पर चलना होगा, और तब गुरु माध्यम से भगवत् कृपा हो सकती है।
अहं ममाभिमानोत्थैः कामलोभादिभिः
मलैः। वीतं यदा मनः शुद्धम् अदुःखम् असुखं सुखम्।
श्रीमद्भागवत शास्त्र की उक्त शुकवाणी तो ऐसा ही कहती प्रतीत होती है।
ऐसी सूक्ष्म शरीर की प्रकृति अहमादि की शुद्धि नहीं होने पर गोस्वामीजी जी अपनी विपत्ति भगवान् से कहते हैं-
मैं केहि कहौं विपति अति भारी।
श्रीरधुबीर धीर हितकारी।
मम हृदय भवन प्रभु तोरा।
तहँ बसे आइ बहु चोरा।
अति कठिन करहिं बरजोरा।
मानहिं नहिं बिनय बहोरा।
तममोहलोभ अहँकारा।
मदक्रोध बोधरिपु मारा।
कह तुलसिदास सुनु रामा।
लूटहिं तस्कर तव धामा।।
चिंता यह मोहिं अपारा।
अपजस नहिं होइ तुम्हारा।।
अब ऐसी अहमादि सूक्ष्म प्रकृति की शुद्धि में भगवत् कृपा ही एक अवलम्
।। हरिः शरणम् ।।