भज गोविन्दं भज गोविन्दं गोविन्दं भज मूढ मते।
भूमि परत भा ढाबर पानी
जिमि जीवहिं माया लिपटानी
आखिर कोटिं त्यक्त्वा हरिं भजेत् को नाना ऋषि कल्प साधु महात्माओं की वाणी क्यों निर्दिष्ट करती है।
बात ये है कि, बिना हरि मनन के मन ,मनमानी करता रहेगा ,इसलिये हर काम करते हुए हरिनाम लेना चाहिए।
परम योगीन्द्र अमलात्मा विमलात्मा व्यासनन्दन श्री शुकदेवजी महाराज इसी माया के भयवशात् बारह वर्षों तक गर्भ में ही रह गये,उनकी वे ही जानें।
जब जन्मे तब किसी की ओर देखा भी नहीं और विविक्त एकान्त वास हेतु विपिन प्रस्थान किया। पीछे-पीछे भगवान् व्यास हा पुत्र! कहते हुए दौड़ पड़े। वृक्षों से भी आवाज आई- शुकोहम्।
तरवो विनेदुः। वृक्षों ने भी सर्वत्र एक परमात्मतत्व का गान किया है। व्यास जी लौट आए, ब्रह्माण्ड के सारे रहस्य को जानने वाले थे।
राजा परीक्षित को तक्षक द्वारा डँसे जाने से सप्ताह के अभ्यन्तर मृत्यु होने का शाप मिलता है। और नाना नारदादि ऋषि-मुनियों के समक्ष राजा परीक्षित, तपःपूत शुकदेवजी महाराज से श्रीमद् भागवत की कथा सुनते हैं। प्रारंभ में ही राजा ने प्रश्न किया था कि प्रत्येक मुमूर्षु अर्थात् मृत्यु की ओर अग्रसर मनुष्य जीव को बचने का क्या उपाय करना चाहिए?
शुकवाणी होती है-
श्रोतव्यः कीर्तितव्यः च
स्मर्तव्यः सः सदा हरिः।।
मतलब कि, जीवात्मा का परम कर्तव्य है कि, वह भगवान् के किसी रामकृष्ण नारायण हरि नामों और उनकी कथाओं का श्रवण, कीर्तन और स्मरण करे।
क्योंकि जिन हरि कथा सुनी नहिं काना श्रवण रन्ध्र अह भवन समाना। और कथा सुनने का प्रतिदिन अभ्यास करते रहने पर भी जीव के समुद्र वत् कान कभी कथासुधारस से भरते नहीं ।
रोज-रोज कथा सुनी जाने पर भी माया से व्यथित जीव की कथामृत पिपासा शान्त नहीं होती।
भुवनभोहिनी अविद्या माया से और जन्म-मृत्यु से बचने के लिए दूसरा उपाय हरिकीर्तन बताया, जिससे स्वयं के अतिरिक्त अन्य नाना जीवों को भी सुगति मिले।
तीसरा उपाय भगवद् स्मरण को बताया है, जो हर एक जगत् के कार्य करते हुए सम्भव है।
यह श्रवण, कीर्तन और स्मरण इसलिये है कि माया तो विस्मरण कराने हेतु सजी धजी बैठी ही है।
कबीर सूर तुलसी की वाणी का आश्रय लेना होगा, जहाँ वेदशास्त्र का मन्थन कर , नवनीत(मक्खन) निकला है।
रमैया की दुलहन ने लूटल बजार। ब्रह्मा को लूटल औ शिव को भी लूटल। लूटल सकल संसार। कबिरा बच गया साहब कृपा से शब्द(हरिनाम) डोर गहि उतरा पार।
इसलिये श्रवणकीर्तनस्मरण पूर्वक हर काम करते हुए हरिभजन ही श्रेयस्कर और मृत्यु से बचने का एकमेवोपाय है, और सब अपाय ही। बाबा ने भी यही सम्मति दी-
हरि माया कृत दोषगुन
बिनु हरि भजन न जाहिं।
भजिअ राम सब काम तजि
अस बिचार मन माहिं।।
।। हरिः शरणम् ।।