स्वारथ एक जीव कर एहा।
होइ रामपदपंकज नेहा।।
यह तन कर फल विषय न भाई।स्वर्गहु स्वल्प अन्त दुखदाई।।
मनुष्य शरीर धारण करने का का एकमात्र प्रयोजन श्रीरामचरणों में निष्काम प्रीति ही है। पृथ्वी लोक से लेकर ब्रह्म लोक तक के भोग नियत अवधि वाले और परिणाम में दुःखप्रद हैं।
बड़ी विचित्र बात है, लेकिन सीधी सरल और वास्तविक-
हम शरीर नहीं हैं।
हम संसार नहीं हैं।
यह परिवर्तन शील, परिवर्तन शील को क्या देख सकता है?
मतलब कि विकारों से उपजा यह शरीर ,बाल्यशैशव,युवा , प्रौढ़ और वृद्धत्व में परिवर्तित हो गया । संसार का प्रत्येक वस्तु व्यक्ति पद पदार्थ भी ,बड़ी तेजी से बदलता ही जा रहा है।
तो अब इस शरीरसंसार का परिवर्तन यह शरीर संसार कभी भी देख नहीं सकता।
तब देखता कौन है?
यह अविकारी अविनाशी सदा अपरिवर्तित परमात्मा का एक छोटा पार्टिकिल आत्मा ही। नष्ट होते शरीर और संसार को देख कर भी उनमें अहन्ता-ममता बना रहना, बड़ा आश्चर्य जनक है।
अरे भाई ! सभी में उस परम तत्व को देखे बिना तात्विक दृष्टि नहीं हो सकती।
हम पूछते हैं कि इस शरीर से ,जब वह परमात्मतत्व हट जाता है, तब क्या हमारी ममता उस शरीर में रहती है?
बिलकुल नहीं।
तो हमारे अपने सभी नाते एक उसी परमात्मा के नाते हैं। हम वस्तुतः प्रेम, जो भी परस्पर करते हैं, वह उसी परम आत्मा से ही करते हैं।
केवल हम पहचान नहीं पाते।
और यह भी केवल शरीर संसार में भोग दृष्टि से।
जब सनातन की योग दृष्टि से देखेंगे, तब विचार बुद्धि विवेक उपजेगा और तब सियाराम मय सब जग जानी हो जायेगा।
भगवान् की प्रचण्ड माया ने हमें मोहित कर सब भुलवा दिया है।
ज्ञानिनाम् अपि चेतांसि देवी भगवती हि सा।
बलाद् आकृष्य मोहाय महामाया प्रयच्छति।
बिनहिं प्रयास होहिं भवभंगा तो नारायण ! सद्गुरु साधु कृपासाध्य ही है।
इस मनुष्य शरीर का परम परम सौभाग्य होता है, जब सन्त भगवन्त कृपा से नष्टो मोहः स्मृतिः लब्धा की स्थिति मिल जाती है।और इसीलिये दिनरात ” राम-राम ” रटने वाले भगवान् उमामहेश्वर इस स्वर्ण मय पर्वत रुप संसार में मोहासक्ति के सहज विनाश को कह पड़ते हैं, जो कि श्रीरामकृष्णनारायण सीता राधा दुर्गा काली की कृपा पूर्ण दृष्टि से देख लेने पर अकस्मात् सम्भव है।नहीं तो क्षणभंगुर संसार का वैभवभंग असम्भव है-
गरुड़ सुमेरु रेनु सम ताहीं।
चितवहिं राम कृपा करि जाहीं।।
।। हरिः शरणम् ।।