जानत तुमहिं तुमहिं होइ जाई

मानव जीवन का अन्तिम लक्ष्य भगवद् दर्शन और प्राप्ति ही है।

 बड़ा रहस्य बन जाता है यह कार्य, क्योंकि कि विशुद्ध चित्त वाले श्रीहनूमान् नारद जैसे सन्त ऋषि का दर्शन भी कठिन है, और जो इस प्राप्तव्य की प्राप्ति करा दें।

 चाहे हनुमानजी महाराज हों या देवर्षि नारद, सभी भगवन् नाम के प्रतिवेशक( नाम को परोसने वाले) अद्वितीय हैं।

 स्वयं प्रभु भी राधा पुकारते पुकारते राधा ही हो जाते हैं, जबकि राधा भी कृष्ण-कृष्ण कहते कहते कृष्ण स्वरूप हो ,जाती है

  यह अंशी-अंश( ईश्वर-जीव)

 राधामाधव, सीताराम तथा शिवाशिव एकाकार तदात्म ही हैं।

  अब जीव भूला क्यों?

ईश्वर अंश जीव अविनाशी।

चेतन अमल सहज सुखराशी

सो मायाबस भयौ गोसाईं।

बँन्ध्यौ कीर मर्कट की नाईं।

 तोते बन्दर की तरह मोह माया के जाले में जकड़ा है।

  यह जंजीर उन्हीं नाम महाराज के नाम से टूटेगी।

सुमिरि पवनसुत पावन नामू।

अपने बस करि राखे रामू।।

  इनके माया की विचित्र लीला भी हे।

 यह परब्रह्म परमात्मा असंख्येय कल्याण गुण गण निलय ,सर्वाधार ,सर्वकारण कारण हैं। देवत्रितयी भी नहीं जान पाती, जब तक कि वे स्वयं जनाना न चाहें।

जग पेखन तुम देखन हारे

आप ही सम्पूर्ण जगत् के प्रेक्षणीय, दर्शनीय हैं।

विधिहरिशम्भु नचावन वारे

कोऊ न जानै मरम तुम्हारा।

जानि लेइ सो जानन हारा।।

वही जान सकता है जो, जानने की अन्तिम सीमा पर जाकर भी हार न माने।

  और,तब तो-

साधुसन्तमाध्यम से प्राप्ति प्रतीति होनी ही है।

और जानने के बाद यह अकिंचन जीव भी, तदाकारा आकारित ही बने तो कोई आश्चर्य नहीं।

सो जानहि जेहु देइ जनाई।

जानत तुमहिं-तुमहिं होइ जाई

।। हरिः शरणम् ।।

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Author: Prof. Shishir Chandra Upadhyay

I am Professor of Sanskrit subject in K.B.P.G College, Mirzapur, Uttar Pradesh, India, since 1991.

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