जौं रघुबीर अनुग्रह कीन्हा।
तौ तुम मोहिं दरस हठि दीन्हा
बिना भगवत् कृपा के सन्त साधु दर्शन नहीं हो सकता। और कृपा ऐसी कि, रामकाज सब करिहौं तुम बलबुद्धि निधान, की स्वतः स्थिति बन जाती है।
और पहले ही यह भी कह देते हैं कि-
अब मोहिं भा भरोस हनुमन्ता।बिनु हरिकृपा मिलहिं नहिं सन्ता।
सार सर्वस्व ये कि भगवदाज्ञप्त, शास्त्रों और सन्तों का आश्रय ,इस मनुष्य जीवन में अत्यंत दुर्लभ है, उसके लिए सतत प्रयास होना चाहिए।
तभी तो श्रीमदाद्य आचार्य शङ्कर ने अपने विवेकचूडामणि के तीसरे पद्य में जिन तीन चीजों को दुर्लभ बताया ,वे हैं-मनुष्यता, मुक्ति की कामना और सद्गुरु पादाश्रय।और वे यह भी कहते हैं कि इन सभी की उपलब्धि भी भगवान् कृपा पर ही निर्भर है।अतः ,सनातन साधन भगवान् के नामों स्मरण हर दशा में होना चाहिए।मनुष्य के चरम लक्ष्य श्रीभगवान् की प्राप्ति कृपा साध्य ही है-
दुर्लभं त्रयमेवेदं देवानुग्रहहेतुकम्।
मनुष्यत्वं मुमुक्षुत्वं
महापुरुषसंश्रयः।
मतलब कि भगवान् की कृपासे सन्त का दर्शन और तत् फलस्वरूप सर्वस्व प्राप्ति,जो श्रीराम कृपा से विभीषण को राज्यादि की प्राप्ति। क्यों? क्योंकि विभीषण भगवत् सम्मुख था और रावण रामविमुख ,तमोगुणी रजोगुणी।इसीलिये-
रामविमुख सम्पति प्रभुताई।
जाइ रही पाई,बिनु पाई।।
अतः
सतत नाम चिन्तन करते रहना चाहिए, जिससे सनातन मार्ग से सनातन सुख मिल जाय-
पर उपकार बचन मन काया।
सन्त सुभाव सहज खगराया।
नहिं दरिद्र सम दुख जग माहीं
सन्त मिलन सम सुख जग माहीं।।
सभी सन्त सद्गुरु के चरणों में प्रीति हो, ऐसी भगवत् कृपा हो जाय।
।। हरिः शरणम् ।।