कमठ अण्ड की नाईं

भगवान् और भक्त का अविच्छिन्न अविचल और अद्भुत सम्बन्ध होता है।

निरन्तर प्रभु स्मराणादि से यह आधाराधेय और तादात्म्य योग बनता है।

 इष्टदेवतासम्प्रयोगः योगः का तात्पर्य भी यही है।केवल प्राणायाम और आसन मुद्रा ही योग नहीं है, यह तो यमनियम से लेकर समाधि तक और भगवच्चरणाश्रय प्राप्ति तक चलने वाला प्रयोग विशिष्ट योग है, जिसमें मन बुद्धि चित्त और अहंकार की शुद्धि होकर भगवदाकारिता का परम चरम प्राप्त होता है।

  भगवान् और भक्त का तद्वत् सम्बन्ध चाहे तो श्रीसीताराम में ही अनुस्यूत रूप में जल और उसकी लहरों के रूप में द्रष्टव्य है, जिनहिं परम प्रिय खिन्न ।

  और नरलीला में तो सहज रूप से जगदम्बा को कहना पड़ता है- 

बचन न आव नयन भर बारी।
अहह नाथ हौं निपट बिसारी।।


यह मानवीय दृष्टिकोण से कही बातें हैं। क्या वे भिन्न हैं।

कदापि नहीं।

जब इस लौकिक जगत् का वासनावासित मलिन चित्त का प्राणी सतत स्मरण से प्रभु से अविच्छिन्नता का अनुभव कर सकता है, तब उनकी कौन जाने?

 इस जीव की प्रार्थना प्रभु से ऐसी होती कि जिसे अद्भुत ही कह सकते हैं।

 वह कहता है-

यह कछुआ स्त्री जैसे अपने अण्डे को बाहर बालुका में रखकर ,केवल उस अण्डे को ध्यान में रखती है और अण्डा उसी ध्यान मात्र से पोषित होकर अपना पूर्ण परिपक्व स्वरूप पा लेता है। नहीं यदि वह दिये हुये अण्डे को भूल   जाय तो वह अण्डा नष्ट हो हो जाता है।ऐसे ही प्रभु अपने प्राणप्यारे भक्तों को कभी भूलें न –

यह बिनती रघुबीर गोसाईं
और आस विश्वास भरोसो
हरो जीव जड़ताई
चहौं न सुगति सुमति संपति
कछु,रिधिसिधि बिपुल बड़ाई
हेतु रहित अनुराग रामपद बढ़ै
अनुदिन अधिकाई।
जहँ तहँ जनि ,छिन,छोह छाड़िहौ, कमठ-अण्ड की नाईं।।

।। हरिः शरणम् ।।

Unknown's avatar

Author: Prof. Shishir Chandra Upadhyay

I am Professor of Sanskrit subject in K.B.P.G College, Mirzapur, Uttar Pradesh, India, since 1991.

Leave a comment