करुणासिन्धु कृपा कीजै

करुणासिन्धु कृपासिन्धु दयासिन्धु दीनबन्धु ही जब  सारे जगत् में भासने लगे,तब इस मानवजीव का जीवन कृतकृत्य हो जाय।

क्यों, क्योंकि प्रभुमूरति कृपामयी है।

होता नहीं, किन्तु होगा अवश्य होगा।

होता इसलिये नहीं कि पूर्व-पूर्व शरीरों की मलिन वासना छूटती नहीं।

यह वासना जिस दिन से ,प्रभु और उनके प्राणप्यारे भक्तों 

नारद, शुक,सनकादि, व्यास, वाल्मीकि, तुलसी, सूर, कबीर, नानक, दादू,मलूक की वाणियों में बस जायेगी, बस मस्ती और ऐसी मस्ती सदा -सदा के लिये आ जायेगी कि जैसे हम शरीर संसार विषयों में रमे हैं , राम में रम जायेंगे। 

और सबसे पहले इस शरीर पिण्ड और तब सारे ब्रह्माण्ड में एक ही दर्शन होगा-

हरिः ओ3म् तत्  सत्।

जगत् का प्रपंच बाधित हो जायेगा ,जीवन का लक्ष्य साधित हो जायेगा।

  ऐसे परम परम सन्तों के हृदय की बजती वीणा और मन का तार  ,सारे अणु परमाणु में उसी ईश्वर के स्वर के नाद का कर रहा है, झंकार  इनकी भगवद् दृष्ट वाणी का आश्रय मिले तो जगत् का सब आश्रम क्रान्त कर परम विश्राम राम में आराम मिले।

जब सब कुछ से हारे
तब केवल प्रभु के सहारे।
और जब तक जगत् से न हारे
तब तक रहेंगे बेसहारे।
जाउँ कहाँ तजि चरन तुम्हारे
काको नाम पतित पावन जग
केहि अतिदीन पिआरे।
देव दनुज मुनि नाग मनुज 
सब मायाबिबस बेचारे।

हमारे गुरुदेव मलूक पीठ वाले महाराज श्री ,जिन्होंने व्रजधाम में परम साधु, योगी और भगवत् प्राप्त सन्तों की सन्निधि पाई थी, उनमें उनके सद्गुरुद्वय अद्वितीय थे।

 ऐसे ही एक सिद्ध सन्त परम पूज्य श्री हरेराम बाबा थे।

  भगवदुन्मुखी उनकी सारवती,सरस्वती ने अनेक पद भगवद् स्मृति में उच्चरित किया है-

 तव विमुख अनेकों जन्म गये 
स्थावर जंगम रूप धरे 
यह पुनरावृत्ति मिटा दीजै
हे करुणासिन्धु कृपा कीजै।

।। हरिः शरणम् ।।

Unknown's avatar

Author: Prof. Shishir Chandra Upadhyay

I am Professor of Sanskrit subject in K.B.P.G College, Mirzapur, Uttar Pradesh, India, since 1991.

Leave a comment