भगवान् की माया अत्यंत दुस्तर है।यह माया त्रिगुणमयी है। सद् रजः तम इसके तीन गुण हैं। इन तीनों से संसार के तीन कार्य क्रमशः सत्व से सुख, रजस् से दुःख और तमस् से मोह ,होते हैं।
इस तरह यह जीव और जगत् इन्हीं से विनिर्मित है।इन्हीं के कारण मन,बुद्धि, चित्त और अहंकार की शुद्धि नहीं हो पाती है।और हम देह इन्द्रियों को मैं तथा भगवान् की सृष्टि में उत्पन्न वस्तु, व्यक्ति, पदार्थ को अपना मान बैठे हैं।
फिरत सदा माया कर फेरा।
काल कर्म स्वभाव गुन घेरा।।
तह संसार नश्वर है, आत्मज्ञ पुरष ही जान पाता है।हम जैसे मलिन अन्तःकरण के जीव इस माया चकित थकित हो रहे हैं-
वदन्ति विश्वं कवयः स्म नश्वरं
पश्यन्ति चाध्यात्मविदः विपश्चितः।तथापि मुह्यन्ति तव अजमायया ,सुविस्मितं कृत्यम् अजं नतः अस्मि तम्।
अब प्रश्न ये है कि, इस श्वान शृगाल भक्ष्य शरीर में ऐसी अहंता क्यों और संसार में ममता क्यों।
तब लगता है कि ये अहंता ममता आदि इस मानव देह के नहीं बल्कि ये पूर्व पूर्व शरीरों से आयातित दुर्गुण हैं।
बिना भगवत् शरण ग्रहण किये, यह माया जायेगी नहीं।
और बात ये भी है कि सब मम प्रिय सब मम उपजाये ,कहने वाले निष्कारण कृपा करनेवाले केवल दो ही लोग हैं, एक स्वयं भगवान् और दूसरे भगवत्प्राप्त सन्त साधु।
हेतु रहित जग जुग उपकारी ।
तुम तुम्हार सेवक असुरारी।
जब हम इनकी कृपा करुणा को पाने का प्रयास करें, तो काम बने-
येषां स एव भगवान् दययेद् अनन्तः, सर्वात्मना आश्रितपदो यदि निर्व्यलीकम्। ते दुस्तराम् अतितरन्ति च देवमायां, नैषां मम अहम् इति धीः श्वशृगालभक्ष्ये।।
भागवतोक्त यह शुकवाणी हो अथवा गीतोक्त भगवद् वाणी-
दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया। मामेव ये प्रपद्यन्ते मायाम् एतां तरन्ति ते।।
।। हरिः शरणम्।।