भगवान् की कृपा की वायु सर्वत्र बह रही है, हम नाम की नाव पर बैठ कर निरन्तर स्मरण की पाल फहरा कर उनके नित्य धाम को जा सकते हैं.
वे अनुग्रह करेंगे ही इसमें रंचमात्र संशय नहीं।
कृपा की न होती जो आदत तुम्हारी तो सूनी ही रहती अदालत मुरारी/पुरारी।
जो रघुबीर अनुग्रह कीना।
तौ तुम मोहिं दरस हठि दीना।
अब मोहिं भा भरोस हनुमन्ता।बिनु हरि कृपा मिलहिं नहिं सन्ता।
सन्त मिलन की आस है
तो हरिजन गुन गाव।
सन्त विशुद्ध मिलहिं परितेही।
चितवहिं राम कृपा करि जेहीं।।
अनन्त कोटि ब्रह्माण्ड नायक सर्वेश्वर परात्पर परमात्मा अपने अंशभूत जीव की बाट जोह रहे ,कि कब देहेन्द्रिय के प्रति राग त्याग कर वह अपने अंशी की ओर उन्मुख होकर उन्मुक्त होगा?
थोड़े से जप स्मराणादि साधन से उन्मुख हो जाने पर,
यज्ञानां जपयज्ञोस्मि वे प्रभु किसी हनुमानजी नारदादि सन्तों को भेजकर क्षण मात्र में अनुग्रह कर देते हैं और विभीषण ,ध्रुव आदि भक्त सब कुछ पा जाते हैं।
वे परम आनंद मूर्ति हैं। निष्काम भाव से भजने पर दीनानाथ तो कृपा करने के लिए तैयार ही हैं।
गाय जैसे अपने बछड़े को वात्सल्य भाव दुग्ध पान कराती हुई व्याघ्रादि से बचाती है, वैसे भक्तवत्सल भगवान् भी माया रूपी बाघिन से बचा ही लेते हैं।
और जीव सदा सर्वदा के लिए
भगवद् आश्रय का अधिकारी हो जाता है। शुकवाणी ऐसी ही है-
सत्याशिषो हि भगवन् तव पादपद्मम्। आशीः तथानुभजतः पुरुषार्थमूर्तेः।
अपि एवमर्य भगवान् परिपाति दीनान् ।वाश्रेव वत्सकम् अनुग्रहकातरः
अस्मान् ।।
|| हरिः शरणम् ||