नृग उद्धरन

मानव जीवन का चरम प्राप्तव्य भगवान् के चरण ही हैं, क्योंकि इसके बिना तो न संसारमोह छूटेगा, और न ही दुःखों की आत्यन्तिक निवृत्ति ही होगी।
उनके समान विपत्तियों को हरनेवाला और दुःसह भव सागर को पार कराने वाला दूसरा कोई नहीं।
क्योंकि जब गजराज अपना बल क्षीण हुआ समझ कर, कमल पुष्प लेकर आपके शरण हुआ, तब भगवान् उसकी दीनता पर द्रवित होकर, सुदर्शन चक्र लेकर, गरुड़ को छोड़ ,बिना पादुका ,पैदल ही आ जाते हैं।
इसी तरह द्रौपदी के वस्त्र हरण काल में भी आप ,स्वयं वस्त्रावतार लेकर उसकी रक्षा करते हैं।
वस्तुतः जब तक किसी को अपने बल पर भरोसा रहता है, तब तक उस सीमा तक ,भगवान् कुछ नहीं करते, लेकिन ज्यौं ही अपने शरीर संसार की अहंता-ममता टूटती है , ससीम जीव की ,असीम परमात्मा रक्षा के लिये आकर ,उसे निर्भय कर देते हैं।
अतः निज बुधि बल भरोस मैं नाहीं की समर्पित अवस्था में ही, प्रभु करुणा करने के लिए बाध्य हो जाते हैं, माया मोह का बाध तत्क्षण ही हो जाता है।
और बात यह भी है कि, कहहु सो कहाँ जहाँ प्रभु नाहीं, की साधु-अवधारणा और ,सर्वं खलु ब्रह्म की वैदिक दृष्टि भी विखण्डित होगी, यदि जगन्नाथ विपत् और प्रतिकूलता में सहायक न हों।
हाँ ,आवश्यक यह है कि, शरीर संसार में अहंता ममता त्याग कर, सब कुछ प्रभु का ही है, ऐसा मानकर, दानादि की क्रिया हो ,भगच्चरणों का सेवन हो , तो महादानी राजा नृग की तरह हम जीवों का भी उद्धार हो ही जायेगा-

इहै जानि सुर नर मुनि कोबिद
सेवत चरन।
तुलसिदास प्रभु! केहि न अभय कियो नृग-उद्धरन।

।। हरिः शरणम् ।।

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Author: Prof. Shishir Chandra Upadhyay

I am Professor of Sanskrit subject in K.B.P.G College, Mirzapur, Uttar Pradesh, India, since 1991.

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