श्रीरामचरणानुराग

जितने -जितने अधिक अंश में भगवच्चरणानुराग होता चलता है, उतने -उतने अंश में संसार के प्रति प्रीति घटती जाती है। भगवच्चरणों में अनुराग और भगवद् दर्शन हि जीव का चरम लक्ष्य है। इसके बिना तो यदि संसारी वस्तुओं में प्रेम बना रहा, तो उस अप्राप्त भोग को भोगने फिर आना ही होगा-
ऐसे ही जन्म समूह सिराने।
गोस्वामी जी कहते हैं कि हमारे अनेक जन्म इस तरह भोगों को भोगने के चक्कर में जा चुके हैं, फिर भी चक्कर चल ही रहा है।
नाना जन्मों में अनेक माता पिता बन्धु बान्धव रिश्ते नाते बन चुके हैं, लेकिन सच्चे प्रेम की अनुभूति के बिना सब बेकार गया, अनेक शरीरों की यात्रा निर्बाध जारी है।
जब तक अपने रिश्ते नाते से शुरू कर के, व्यक्ति-व्यक्ति में उस प्रेम तत्व साक्षात् राम कृष्ण नारायण की अनुभूति नहीं होगी ,बात बनेगी नहीं।
हमारे गुरुदेव कहते हैं, कि इस अनुभूति के लिए हम ऐसा समझें कि माता-पिता गुरु अतिथि तो वेदाज्ञप्त देवता ही हैं,( मातृदेवो पितृदेवो आचार्यदेवो भव)।
किन्तु अब बात इससे आगे की अनभूति की है, वह यह कि हमारे पुत्र हैं , तो भगवान् ही पुत्र के रूप में आए हैं।
बधू है ,तो भगवान् ही बधू के रूप में आए हैं। इस तरह अपने सगे सभी सम्बन्धों में भगवान् की अनुभूति होनी चाहिए।और उसके आगे भी यही अनभूति-दृष्टि बने ,तो काम बने ,लेकिन संसार के भोगों से थका हारा होकर भी ऐसी दृष्टि और अनुभूति क्यों नहीं?
तब गुरु देव समाधान देते हैं- शरीर की मलिनता की शुद्धि तो जल में स्नान से प्रतिदिन होती है, किन्तु आत्मा की रोज-रोज की और नाना शरीरों की जमी गन्दगी कैसे छूटेगी?
इसके लिये सत् शास्त्रों और सूर कबीर तुलसी की वाणियों के सरस रस में आत्मा का दिन-प्रतिदिन प्रक्षालन करना होगा। यहीं पुराणों शास्त्रों का निचोड़ा गया अमृत जल बहता है, जिनकी हरिकथा की अविरल धारा में आत्मा को रोज बिना नागा नहवाना होगा ,तब आत्मा की शुद्धि होकर सभी रूपों में हरिदर्शन होने लगेगा, और माया की भी नहीं लगेगी। इसलिए मानसकार ने कहा-


बिनु सतसंग न हरिकथा,
तेहि बिनु मोह न भाग।
मोह गए बिनु राम पद ,
होइ न दृढ़ अनुराग।।

जित देखूँ तित श्याममयी है।

।। हरिः शरणम् ।।

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Author: Prof. Shishir Chandra Upadhyay

I am Professor of Sanskrit subject in K.B.P.G College, Mirzapur, Uttar Pradesh, India, since 1991.

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