बड़ा कठिन है संसृति के चक से छूटना, और भगवदीय स्वरूप को आत्मसात् करना। ईश्वरीय चैतन्य और सततसुख रूपता को छोड़, यह जीव बार- बार संसार की नाना योनियों में भटक कर माया में अटक कर पुनर्जन्म और ध्रुव मृत्यु में चलता ही रहता है। सो मायाबस भयौ गोसाईं, बँध्यौ कीर मर्कट की नाईं। तब आखिर इस माया से मुक्ति मिलेगी कैसे?
बात ये है कि, अविनाशी ईश्वर का अविनाशी अंश, यह जीव अपने ही तीन कर्मों की रस्सी से बँधा है । यह तीन कर्म हैं- क्रियमाण( जो वर्त्तमान में चल रहा है), संचित (जो इस शरीर से होकर जुटता जाता है) और प्रारब्ध (पूर्व पूर्व शरीरों का जुटा हुआ)। अब ये तीन-तीन कर्मों की रस्सी बनी हुई है। जो परस्पर एक दूसरे तीसरे से मिलकर एक मोटी और जल्दी न टूटने वाली रस्सी बन चुकी है। यह बेचैन बेचारा जीव रूपी बछड़ा गले में पड़ी इसी खूब कसी कर्म डोर से माया के खूँटे में लपेट कर बँध गया है। पार्थः वत्सः , मतलब कि जैसे अर्जुन बछड़ा है,और और वेदादि शास्त्र के अमृत मय ईश्वरीय वचन दूध के समान हैं, उसे पीने को आतुर यह(जीव बछड़ा) होकर जोर से मचल रहा है,लेकिन विवश। बिना परमात्मा रूप धेनु से निःसृत वेदशास्त्र रूप अमृत दुग्धपान किए यह बार बार मृत और जात( मृत्युजन्म) के चक्कर में फँसा ही रहेगा।
तब भगवान् अपने सखाओं रूपी निष्कामी तुलसी कबीर मलूकदास सदृश सन्त सद्गुरु को इस माया के खूँटेऔर स्वयं की कर्म डोर से बँधे बछड़े को छोड़ने का आदेश देते हैं।
फलतः कर्मों की रस्सी जल जाती है, माया का अटूट खूँटा सदा सर्वदा के लिये टूट जाता है, और यह जीवबछड़ा , जो अब तक बिछुड़ा और उदास रहता था, भगवद् अमृत दुग्ध को पीकर उन्मुक्त हो जाता है ।
सन्त सद्गुरु उनकी अपनी वाणियों में सदा सर्वदा विराजते हैं। हम उनकी वाणी का आश्रय लें।और उन्हीं की तरह संसार चक्र से छूट जायें। नान्य पन्थाः विद्यते अयनाय ,अर्थात् मानव जीवन का और कोई सुन्दर मार्ग नहीं चलने के लिए।
सभी सन्त गुरु भगवान् के सखा और तत् स्वरूप हैं-
वे सभी सन्त, साधु –
त्रेता में बानर भये,
द्वापर में भये ग्वाल।
कलजुग में साधू भये,
तिलक छाप अरु माल।।
ब्रजरज में विराजित षड् गोस्वामी बन्धुओं में एक श्री जीव गोस्वामी ने अपनी श्रीमद् भागवत की संस्कृत भाषा भाषोक्त टीका में ऊपर उक्त दोहे का भाव संस्कृत में दिया है।
अतः परम पूज्य साधु सन्तो गुरु जनों की कृपा हो,और संसार चक्र छूट जाय।
।। हरिः शरणम् ।।