वे करैं आप समान

देखिये , सनातन काल से ,युगों-युगों से हमारी ऋषि परम्परा ने कृपा करुणा परवश होकर, मानव जीव को बार-बार के जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त होने का मार्ग दिखाया है।
शिवावतार श्रीमदाद्य भगवान् शङ्कराचार्य ने बड़ा साहित्य रचकर मुमक्षुओं का पथ प्रशस्त किया है। अच्छा, हमारे गुरुओं की वाणी ने मानव शरीर ही नहीं ,प्रत्युत पशु शरीरों में भी पड़े बद्ध जीवों को हरिनाम सुनाकर, उसी शरीर से मुक्त कर दिया, जिसको साधक जन पवित्र ग्रन्थ “भक्तमाल” में देख सकते हैं।
आचार्य शङ्कर कहते हैं-
बद्धो हि को यो विषयानुरागी
मतलब कि, पृथ्वी जल अग्नि वायु आकाश के-गन्धरसरूप और स्पर्श शब्दादि विषयों यानी कि स्त्री पुत्र धनादि में आसक्ति यदि बनी रही,तो चौरासी का चक्कर कहाँ छूटेगा?
तब आचार्य तत्काल उत्तर भी दे देते हैं-
मुक्तो हि को यो विषयाद् विमुक्तः।
अर्थात् उक्त पंचमहाभूतों के शब्दादि विषयों से ,जो विरक्त हो गया, वही मुक्त है।
अब सवाल उठता है कि, मुक्ति कैसे होगी?
तब यह गुन साधन ते नहिं होई, तुम्हरी कृपा पाव कोइ कोई , मानसकार समाधान करते हैं।
देखिये ,सन्त सद् गुरु ही ऐसे नित्य मुक्त भक्त हैं, जिनके माध्यम से भगवान् की कृपा आती है।और आती ही नहीं, बल्कि बरसती है।


हरै शिष्य धन सोक न हर ई।
सो गुरु घोर नरक महँ पर ई।।


ऐसे गुरुओं की भरमार है, कलियुग जो है न, वह तो काम बिगाड़ेगा ही।
इसलिये गुरु अपनाना हो तो ,पहले ऐसे लोगों की रहनी-सहनी को लम्बे समय तक ,निरखे और तब उनका पादाश्रय लेकर आगे बढ़े।


पानी पीवै छानकर।
गुरू करै जानकर।।


हमारे सद्गुरु तो कम से कम ऐसा ही कहते हैं, नहीं तो हरि नाम का आश्रय लें।
और यदि भगवान् से जुड़े, संसार के भौतिक पदपदार्थों से नहीं जुड़े रहनेवाले सन्त जन का चरणाश्रय मिल गया तो ,का बन गया।और वे सन्त तो ,जीव को अपने समान ही, साधु बनाकर अविगत गति दे देते हैं, इसीलिये तो-


पारस में अरु सन्त में ,
एकै अन्तर जान।
पारस तो सोना करै,
वे करैं आप समान।।

।।हरिः शरणम्।।

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Author: Prof. Shishir Chandra Upadhyay

I am Professor of Sanskrit subject in K.B.P.G College, Mirzapur, Uttar Pradesh, India, since 1991.

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