अन्तः प्रभुस्मरण

भगवान् कहते हैं , माम् अनुस्मर युद्ध च। मतलब कि मेरा स्मरण करो ,और साथ ही निर्धारित कर्तव्य कर्म, युद्ध भी करो। क्योंकि सर्वकारण कारण, मेरा स्मरण करते हुए कर्तव्य कर्म करोगे तो ही ,सफल हो सकते हो और बात ये भी है कि, कर्म में ही तुम्हारा अधिकार भी है, फल में कदापि नहीं।
वस्तुतः यह मानव का जीवन, संसार से बड़े संघर्ष का है, अतः समग्र जीवन में प्रभु स्मरण करते हुए ,प्रत्येक श्वास-प्रश्वास में इसी श्वास की गति से , भगवन् नाम का मानसिक जप करते हुए ,अपना सभी काम करना चाहिए, सन्तभगवन्त का निर्दिष्ट मार्ग ही यही है।
इस कलि का दूषण और मायिक जगत् की निवृत्ति, आत्मस्वरूप की उपलब्धि का महत्तर मानवीय कर्म उसी सर्वकारणकारण की हर साँस में स्मृति से ही सम्भव है, अन्यथा तो हम जीव ठहरे मायाधीन, और वे मायाधीश।
अज्ञान की निवृत्ति, ज्ञान का प्रकाश भगवद् स्मृति से होती है, नष्टो मोहः स्मृतिः लब्धा त्वत् प्रसादात् मया अच्युत!।
भगवत् प्राप्त सन्त सद्गुरु भी यही कहते हैं,कि प्रेम रूप परमात्मा जब हमारे ही हृदय में विराजता है, तब किसी को जनाने की जरूरत नहीं। वह गोय (गोपनीय) सर्वान्तर्यामी है, शरीर की किसी क्रिया मात्र से प्रभु नाम का सुमिरन ,किसी को प्रकट न होने दें-


सुमिरन ऐसा कीजिए,
दूजौ लखै न कोय।
होठ न फरकत देखिये,
प्रेम राखिये गोय।।
जो तेरे घट प्रेम है,
तो कहि-कहि काह जनाव,
अन्तरजामी जानते,
अन्तरगत के भाव ।।


ऐसे परम सिद्ध योगी बाबा मलूकदास की वाणी में बही प्रेमरसधारा का पान ,उन्हीं की कृपा और प्रभुकरुणा से हो जाय,यही अकिंचन की अभिलाषा है।

।। हरिः शरणम् ।।

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Author: Prof. Shishir Chandra Upadhyay

I am Professor of Sanskrit subject in K.B.P.G College, Mirzapur, Uttar Pradesh, India, since 1991.

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