परम योगी महाराज भर्तृहरि ने जिन तीन शतकों -नीति शृंगार और वैराग्य की रचना करके , अपनी महत् प्रतिभा का प्रतिमान प्रस्तुत किया है, उनमें वैराग्य शतक अत्यंत महत्वपूर्ण है।
संसार के भोगों को वे भोगे रोगभयम् ,कहते हैं।और भोगों को भोगने की तृष्णा को, वह कहते हैं कि ,तृष्णा तो जीर्ण होती नहीं, हम ही जरा जर्जर होकर शरीर पूरा कर लेते हैं।
तृष्णा न जीर्णा वयमेव जीर्णा
भोगा न भुक्ताः वयमेव भुक्ताः
और तृष्णा गई नहीं ,वह तो भोगों को भोगते-भोगते और भी तरुण हो गई।
तृष्णैका तरुणायते।।
अब सोचिये, कामनाओं के भोग से काम की शान्ति नहीं।
प्रज्वलित अग्नि में घी डालने से, वह बढ़ेगी ही।
और संसार में इस धरती का समस्त अन्नधनधान्य पुत्र स्त्री स्वर्ण रजतादि,किसी एक मनुष्य को मिल जाय तो भी ,उसकी तृष्णा शान्त नहीं होगी।
यह भोगों की तृष्णा बहुत बड़ी दुर्मति है, जिसे छोड़े बिना,अनन्त सुख प्राप्ति असम्भव है।शरीर के सारे अंग उपांग जीर्ण जीर्णतर होते जाते हैं, किन्तु धनाशा और अधिक भोग भोगने की आशा में जीवन की आशा छूटती नहीं, शरीर छूट जाता है –
जीर्यन्ति जीर्यतः केशाः
दन्ताः जीर्यन्ति जीर्यतः।
धनाशा जीविताशा च
जीर्यतः अपि न जीर्यतः।।
अतः मानव जन्म के अन्तिम उद्देश्य की प्राप्ति में बाधक इस भोगवासना को तो छोड़ना ही पड़ेगा।
श्रीरामकृष्ण परमहंस देव ने इन सभी भोग प्राप्ति की विकलताओं को छोड़ने के लिये अपने वचनामृत में भगवान् के किन्हीं नामों के जप स्मरण का निर्देश किया है।वह कहते हैं कि, जब नाम जप से भगवद् दर्शन की व्याकुलता जगेगी, तब सारे भोगों की तृष्णा स्वतः निवृत और नष्ट हो जायेगी।
अपने वचनामृत में उन्होंने प्राचीन भारत की एक कथा का उल्लेख किया है। एक युवा सन्यासी भिक्षा के लिये जाता है।द्वार पर उस गृहिणी की युवा पुत्री आकर, भिक्षादान के लिए प्रस्तुत होती है। युवती के वक्ष पर उसके स्तनों को देखकर, सन्यासी युवक जोर -जोर से रोने लगता है।
रुदन सुनकर उसकी माता दौड़कर आती है।और रोने का कारण पूछती है। सन्यासी कहते हैं कि मैं भिक्षा नहीं लूँगा माँ। इसके शरीर पर दो बड़े फोड़े हो गए हैं, इसको कितनी पीड़ा होगी।
उसकी माँ हँसकर बताती है कि, यह इसके युवा होने और गृहस्थाश्रम में प्रवेश करके विवाह के पश्चात् सन्तान उत्पन्न करने की अवस्था है।
जब इसकी सन्तान होगी ,तब उसके लिए करुणासागर भगवान् इन फोड़े जैसे दीखने वाले इसके स्तनों में दूध भर देंगे, और उसे पीकर इसका सन्तान बड़ा होगा।
भगवान् अत्यंत करुणा कृपा की मूर्ति हैं, जो आने वाली सन्तान के लिए पहले ही सजग होकर व्यवस्था कर देते हैं।ऐसा सुनकर कर युवा सन्यासी भगवान् के लिये व्याकुल होकर भिक्षापात्र फेंक कर वन में चला जाता है। धन्य भारत देश और यहाँ की त्याग तपोमयी संस्कृति, जहाँ भोग के लिए नहीं, योग के लिए स्थान है।और इसीलिये इस भोग तृष्णा से वितृष्ण होने का सन्देश भगवान् व्यास देते हैं-
यत् च कामसुखं लोके ,
यत् च दिव्यं महत् सुखं।
तृष्णासुखक्षयसुखस्यैते
नार्हतः षोडशीं कलाम्।।
।। हरिः शरणम् ।।