श्रेष्ठ साधन – नाम जप



मोहनिशा सब सोवनहारा।देखहिं सपन अनेक प्रकारा।
मोह-अज्ञान-अविद्या या संसार के शब्द-स्पर्श-रूप-रस-गन्ध की मोहासक्ति रूप रात्रि के वश में हम सभी अपना सत् चित् आनन्द स्वरूप भूल बैठे हैं। स्वर्णमय अग्नि के रूप में आसक्त पतिंगा और आहार का रस लेने को आतुर मछली छिपे हुए चारे के नीचे का लौह काँटा न जानकर अपना प्राण ही द देते हैं। अब हम जैसे जीवों की दशा तो इनसे भी खराब है, जो इन विषयों को प्रत्यक्ष विपत्ति रूप देख कर भी इन्हें नहीं त्यागते।अस्थिर संसार के अस्थिर वस्तु-व्यक्ति-पदार्थ ने नाना जन्मों में भटकाया ही है-ऐसे ही जन्म समूह सिराने। आकाशादि पंच भूतों का यह संसार है तो शरीर भी। दोनों में तत्वतः समानता है।इसी से शब्दादि विषय रमणीय लगते हैं।एक और विशिष्ट गुणत्रय, सत् ,रज और तम भी इनमें है, जिससे क्रमशः सुख -दुःख और मोह की अनुभूति होती है। वैसे यह त्रिगुण, श्रीभगवान् की भुवनमोहिनी अविद्या माया के हैं, जिनके अधीन यह जीवात्मा जन्म-मरण-बन्धन-ग्रस्त है। इसे खोलने ,मोहनाश करने और जीव-परमात्म सम्बन्ध से विस्मृत और संसार से विस्मित जीव के लिये श्रीहरि अपनी ममता प्रकट करते हैं- ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः

परमकरुणावरुणालय मायाधीश की मायाधीन के प्रति अभिव्यक्त यह ममता ही है, जो पाप-पुण्यों के फलरूप नरकस्वर्गादि लोकों के भोग में अविश्रान्त जीव को परम विश्राम देने के लिए, मानव शरीर दे देती है। यह शरीर और संसार साध्यरूप भगवान् का इन्हीं चर्मचक्षुओं से प्रत्यक्ष दर्शन करके कृतकृत्य होने का साधन है- साधनधाम मोक्ष करि द्वारा।

भगवच्चरणानुरागी जनों के लिए विषयभोग त्यागने नहीं होते ,वस्तुतः वे स्वयं नामजप के प्रभाव से छूट जाते हैं। नाम के जप में श्रीमन्नारायण की समग्र शक्ति निहित होती है और नामजप के लिये देशकालगत शुद्धि की आवश्यकता भी नहीं है, बल्कि यह अपवित्र को भी पवित्र करनेवाला है।श्रीचैतन्य महाप्रभु पाद ने कहा- नाम्नाम् अकारि बहुधा निज-सर्वशक्तिः तत्रार्पिता नियमितः स्मरणे न कालः।

नाम जपत मंगल दस दसहूँ को व्यवहार में लाकर जिह्वा को स्वाद मिले न मिले, नाम जपस्मरण करना चाहिए। सारे भगवत्स्वरूपों में अभेद मानते हुए किसी भी भगवत् स्वरूप का स्मरण और श्रीरामकृष्ण नारायण नाम का जप सभी यज्ञयोगादि से श्रेष्ठतम है- राम राम राम जपु जिय सानुराग रे। कलि ना विराग जोग संयम समाधि रे।