साधु समाज प्रयाग

अकारण वरुणा के मूर्त विग्रह स­­­न्त सद्गुरु का सामीप्य और उनकी कृपा जब किसी जीव पर बरसती है, तो वह धन्य-धन्य हो जाता है । इतिहास-पुराण इस बात का साक्षी है कि पापनिष्ठ “अजामिल” पर कृतज्ञता प्रकाशित करने के लिए सन्त-महात्माओं ने उसकी पत्नी की गर्भस्थ संतति का नाम ही “नारायण” निर्धारित कर दिया और इसी पुत्र नाम के उच्चारण के बहाने से बारंबार नारायण-नारायण रटती हुई उस दुराचारी की रसना सार्थक हुई और “अजा” (माया) से मिला वह “अजा” से अमिल (विहीन) होकर सद्गति को प्राप्त हो गया । श्री राम कथा के एक प्रसंग में जगदंबा श्री जानकी जी के प्रति अपराध बनने से व्यथित इन्द्रपुत्र “जयन्त” भगवान श्री राम के तृणमय बाणों से बचने के लिए जब तीनों लोकों में शरण नहीं पाता तब नामनिष्ठ कोमलचित महात्मा नारद जी की अकारण कृपा दृष्टि का पात्र बनकर माता की अनन्य शरणागति से सन्तकृपा द्वारा ही प्राणों की रक्षा कर पाता है ।

असम्भव को सम्भव करने का यह सारा श्रेय उन “पर दुख-दुखी संत सुपुनीता” सन्त महात्माओं का ही है । निश्चित रूप से, भगवत्प्राप्त विशुद्धहृदय साधु सन्तों का दुर्लभ-दर्शन भगवान की कृपा का फल है अथवा यह कहें कि भगवान जिस किसी जीव पर कृपा करना चाहते हैं, उसके लिए अपने भक्तों को ही माध्यम बनाते हैं, जिससे वह सदा-सदा के लिए मायिक बन्धनों से मुक्त हो जाता है देखिये – 


राम राज बैठे त्रैलोका । हरषित भये गये सब शोका ।
बयरु न कर काहू सन कोई, राम प्रताप बिषमता खोई ।।

इन सारी पंक्तियों का एक आशय यह भी है कि जिस किसी नाम-रूप-लीला-धाम निष्ठ महात्मा की चित्तवृत्ति में अविस्मृत रूप में भगवान् बैठ जाते हैं, वही वीतशोक होकर प्रमुदित रहता है और श्री राम कृपा से निर्वैर होकर सभी द्वंद्वों और विषमताओं से मुक्त भी हो जाता है । कलिपावनावतार गोस्वामी जी कहते हैं –

          गिरिजा सन्त समागम सम न लाभ कछु आन। बिनु हरि कृपा न होइ सो, गावहिं वेद पुरान॥

वस्तुतः भगवत्स्वरूप सन्त सद्गुरु में सत्-चित् और आनंद का ऐसा प्रवेश और समावेश होता है कि वह किसी भी योनि में भटकते हुए “जीव” को अपना आश्रय प्रदान कर सतत मोद और मंगल से परिपूर्ण करने में समर्थ है । निःसंदेह सन्त समागम से बड़ा कोई लाभ नहीं है और यह समागम भी भगवत्कृपा से ही बनता है । इस स्वरूप की प्राप्ति को वेद शास्त्र नेति-नेति (इतना ही नहीं बल्कि इससे भी आगे और कुछ) कहकर प्रमाणित करते हैं ।

नारायण! विभिन्न तीर्थों में जाने का तो परिश्रम करना पड़ता है और वहां जाकर शुद्धान्तःकरण से सविधि धर्माचरण करना पड़ता है, तब जाकर मोक्षादि परम पुरुषार्थों की सिद्धि होती है । इसमें भी धर्मार्थकाम तो इसी शरीर से उपलब्ध होते हैं किन्तु अंतिम पुरुषार्थ रूप “मोक्ष” की प्राप्ति शरीर त्याग के बाद होती है । किन्तु “तीर्थी कुर्वन्ति तीर्थानि” वाला यह सरल चित साधु समाज ऐसा चलता-फिरता तीर्थराज प्रयाग है जिसकी शरणागति-त्रिवेणी में स्नान करके जीवमात्र इसी शरीर के रहते हुए जीवन्मुक्त हो जाता है –

         सुनि समुझहिं जन मुदित मन,मज्जहिं अति अनुराग। लहहिं चारि फल अछत तनु साधु समाज प्रयाग॥