वाद-विवाद नहीं

बड़ा ही विचित्र समय है,जब हम सबको किसी कुतर्क में न पड़ कर समष्टि की रक्षा भावना से निर्दिष्ट नियमों का पालन करना चाहिए। ऐसी वैश्विक विभीषिका का सामना जब हम कर रहे हैं, तब अपने घरों में रह कर ईश्वरीय चिन्तन करते हुए समय व्यतीत करना श्रेयस्कर है।
यही बातें विभिन्न सन्दर्भों में सर्वत्र कही गई हैं। ब्रह्मसूत्र कहता है-   ‘ तर्काप्रतिष्ठानात् ‘
मतलब की तर्क से तत्व और लक्ष्य प्राप्ति सम्भव नहीं। ‘नैषा तर्केण मतिरापनेया ‘ का उद्घोष नचिकेता संवाद में सन्निहित है।  वादे-वादे जायते तत्वबोधः का सिद्धांत श्रद्धालु जिज्ञासु शिष्य और गुरु के द्वारा
शंका निवारण के लिए सही है।
अतः वर्तमान काल में और आज के सन्दर्भ में हो अथवा यह तो सार्वकालिक श्रेष्ठ मत है कि हम सभी को तर्क-कुतर्क से दूर होकर ईश्वरीय चिन्तन-मनन और भजन अपने-अपने भाव से अपने घरों के मन्दिरों से करना होगा।
गोस्वामीजी इसी भाव का स्मरण करते हैं
अस विचारि जे तग्य विरागी।
रामहिं भजहिं तरक सब त्यागी।।
और
अस बिचारि मतिधीर,
तजि कुतर्क संसय सकल।
भजहु राम रघुवीर ,
करुनाकर सुन्दर सुखद।।

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