नाम महाराज की वन्दना – २

साधक नाम जपहिं लय लाए।
होहिं सिद्ध अनिमादिक पाए।।

साधक को अनेक सिद्धियाँ स्वतः प्राप्त हो जाती हैं ,यदि वह भगवान् नामों का भाव पूर्वक जप करे।
ऐसी बात कहने के बाद गोस्वामी जी नाम महाराज वन्दन में आगे कहते हैं-

चहूँ जुग चहुँ श्रुति नाम प्रभाऊ।
कलि विशेष नहिं आन उपाऊ।।

मतलब कि चारों युगों और वेदों तक में नाम का माहात्म्य बताया गया है, किन्तु कलियुग में तो इसके सिवाय अन्य विशेष कोई ऐसा उपाय भी नहीं है। सगुन और निर्गुन भगवत् स्वरूपों में एक को दारुगत( लकड़ी की भाँति) और दूसरे को अग्नि सहित दारु के समान मानना चाहिए।दोनों प्रकट और अप्रकट का अन्तर है, लेकिन प्रकट और सगुन नाम का अपार प्रभाव है-

निरगुन ते एहिं भाँति बड़,
नाम प्रभाउ अपार।
कहौं नाम बड़ राम ते,
निज विचार अनुसार ।।

नाम का जप करते रहने पर अनायास ही भक्ति महरानी आ विराजती हैं, और भक्त को मोद और आनंद की प्राप्ति होती है-

नाम सप्रेम जपत अनयासा।
भगति होहिं मुद मंगल वासा।।

नाम का स्मरण करते-करते तो यह भव सागर रूपी अगाध समुद्र सूख ही जाये-

नाम लेत भवसिंधु सुखाहीं।
करहुँ विचार सुजन मन माहीं।।

जो भक्त भगवान् के नाम का स्मरण करते हैं, सहज ही उनके अज्ञान का विनाश हो जाता है-

सेवक सुमिरत नाम सप्रीती।
बिनु श्रम प्रबल मोहदल जीती।।

ऐसा भक्त अपने अन्तःकरण में आनंद का अनुभव करते हुए विचरण करता है।और नामस्मरण की प्रसन्नता को तो स्वप्न में भी नहीं सोचा जा सकता है-
फिरत सनेह मगन सुख अपने।
नाम प्रसाद सोच नहिं सपने।।
भगवान् उमामहेश्वर ने सत कोटि राम चरित्र में रामनाम को परब्रह्म से बड़ा और समस्त सुख का मूल जानकर उसे अपने हृदय में धारण कर रखा है-
ब्रह्म राम ते नाम बड़,
वर दायक बर दानि।
रामचरित सत कोटि महँ,
लिय महेश जिय जानि।।
और क्या कहें भगवान् शिव तो रामनाम का प्रसाद ग्रहण करते-करते अमंगल वेश धारण करने पर भी मंगलदान की खान ही हो गए हैं-
नाम प्रसाद संभु अविनाशी।
साजु अमंगल मंगल राशी।।
शुक, सनकादि और नारदादि सिद्ध-योगीजन नाम के प्रसाद से ही ब्रह्म सुख का अनुभव करते भगवान् के अति प्रिय हो गए हैं-
सुक सनकादि सिद्ध मुनि जोगी।
नाम प्रसाद ब्रह्मसुख भोगी।।
नारद जानेउ नाम प्रतापू ।
जग प्रिय हरि हरि हर प्रिय आपू।।

और क्या कहें इस नाम कोही जपते-जपते प्रह्लाद जी भक्तशिरोमणि हो गए। ध्रुव जी ने बड़े कष्ट पूर्वक नामजप से अन्तरिक्ष में अचल और अनुपम स्थान पा लिया।और भक्तराज हनुमानजी महराज का तो कहना ही क्या, उन्होंने तो इसी नाम स्मरण से भगवान् को वश कर रखा है-
नाम जपत प्रभु कीन्ह प्रसादू।
भगत सिरोमनि भे प्रहलादू।।
ध्रुव सगलानि जपेउ हरि नाऊँ।
पावा अचल अनूपम ठाऊँ।।
सुमिरि पवनसुत पावन नामू।
अपने बस करि राखे रामू।।
अपवित्र अजामिल और गज, गणिका आदि भी इसी के कारण मुक्ति धाम को प्राप्त कर गए-
अपतु अजामिल गज गनिकाऊ।
भये मुकुत हरि नाम प्रभाऊ।।
भगवान् श्रीराम का नाम कलि काल में कल्पवृक्ष के समान अभीष्ट की सिद्धि करने वाला है। इसके प्रभाव से मानव का समस्त शोक नष्ट हो जाता है। इसकी महिमा अनन्त है। और इस नाम की बड़ाई और वर्णन कहाँ तक करें , स्वयं प्रभु भी अपने नाम के गुणों का वर्णन नहीं कर सकते-
कहौं कहाँ तक नाम बड़ाई।
रामु न सकहिं नाम गुन गाई।।
इस प्रकार बालकाण्ड में गोस्वामी जी ने भगवान् के नामजप-स्मरण की पूर्णता बताते-बताते अन्त में किसी भी देशकाल परिस्थिति और भाव स्वभाव की दशा में इसे सर्वत्र आनन्द और मंगल का मूल कहा है-
भायँ कुभायँ अनख आलसहूँ।
नाम जपत मंगल दिसि दसहूँ।।

भगवान् की कृपा और उनके चरणों के अनुग्रह से उनके नाम की सतत स्मृति बनी रहे, ऐसी कृपा-करुणा सन्त-भगवन्त दोनों ही करें।

।। हरिः शरणम् ।।

http://shishirchandra.com/2019/11/12/नाम-महाराज-की-वन्दना-२/

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Author: Prof. Shishir Chandra Upadhyay

I am Professor of Sanskrit subject in K.B.P.G College, Mirzapur, Uttar Pradesh, India, since 1991.

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