नाम महाराज की वन्दना – १

कलिपावनावतार गोस्वामीजी बालकाण्ड के प्रारम्भ में ही, ” नाम ” की वन्दना करते हैं।वे कहते हैं कि, मैं श्रीरघुनाथजी के राम-नाम की वन्दना करता हूँ , जो कृशानु(अग्नि) भानु(सूर्य)और हिमकर
(चन्द्रमा) के हेतु हैं ,क्योंकि ये ती अक्षर
क्रमशः ” ” “ ” और “” उक्त तीनों के
बीज रूप हैं।यही नाम ब्रह्माविष्णुशिव का
रूप , वेदों का प्राण,निर्गुण-सगुण-ब्रह्म और सारे गुणों का कोश है-

वन्दौ नाम राम रघुवर को।
हेतु कृशानु भानु हिमकर को।।
विधि हरि हरमय वेद प्रान सो।
अगम अनूपम गुन निधान सो।।

यह नाम ही ऐसा है, जिसका उलटा रूप मरा-मरा कहते हुए अशुद्ध निषिद्ध कर्म करनेवाले वाल्मीकि जी विशुद्ध हो गए। साथ ही यह जान कर कि एक बार भी जपा गया रामनाम, भगवान् के हजार नामजप का फलदायक है, जगदम्बा पार्वती सदैव अपने पति(शिवजी) के साथ राम नाम जपा करती हैं-

जानि आदिकवि नाम प्रतापू।
भयेउ शुद्ध करि उलटा जापू।।
सहस नाम सम सुनि शिव बानी।
जपि जेई पिय संग भवानी ।।
राम रामेति रामेति रमे रामे मनोरमे।
सहस्रनाम तत्तुल्यं रामनाम वरानने।।

इन्ही नाम महाराज का जप करते हुए भगवान् शिव ने काशी-क्षेत्र को मुक्ति दायक बना दिया और उनके पुत्र श्रीगणेशजी ने लोकालोक में सर्वत्र प्रथम पूजनीयता प्राप्त कर ली-

महामन्त्र जेहि जपत महेसू।
काशी मुक्ति हेतु उपदेसू ।।
महिमा जासु जानि गनराऊ।
प्रथम पूजिअत नाम प्रभाऊ।।

ब्रह्म-जीव सम सहज सँघाती और नारायण सम सरिस सुभ्राता ये दोनों “” और “” जीवात्मा-परमात्मा की स्वाभाविक एकता को दिखाते हैं। और तो और ये “भक्तिस्त्री” के कर्णाभूषण दोनों अक्षर जगत् के लिये हितकारी सूर्य-चन्द्र हैं-

भगति सुतिय कलकरन विभूषन।
जग हित हेतु विमल विधु-पूषन ।।

ये ही सुन्दर गति(मुक्ति) रूपी अमृत के स्वाद और तृप्ति के समान हैं। कच्छप और शेषनाग के समान धरती को धारण करने वाले तथा भक्तों के मन रूपी कमल में बिहरने वाले भ्रमर एवं जिह्वा रूपी यशोदा के लिए कृष्ण-बलराम हैं-

स्वाद तोष सम सुगति सुधा के।
कमठ शेष सम धर वसुधा के ।।
जनमन मंजु कंज मधुकर से।
जीह जसोमति हरिहलधर से।।

इस रामनाम का “” अक्षर छत्र के समान और “” अक्षर मुकुट-मणि के समान सभी वर्णों के ऊपर होकर विराजता है। रेफस्य ऊरध्वगमनम् और मोनुस्वारः –

एक छत्र एक मुकुटमनि,
सब बरननि पर जोउ ।
तुलसी रघुवर नाम के,
बरन विराजत दोउ ।।

नाम (राम) लेने पर नामी(रूप) प्रकट हो जाता है। इस नाम-रूप में कौन छोटा या बड़ा है, यह कहना अपराध है, क्योंकि नाम-नामी में अभेद। संसार का भी सहज ही नियम है कि, नाम लेने पर नामी आ जाता है, इसे साधु-महात्मा-भक्तजन बखूबी जानते हैं-
को बड़ छोट कहत अपराधू।
सुनि गुनि भेद समुझिहहिं साधू।।
इस प्रकार का ” राम” नाम का मणि रूपी दीपक जिह्वा रूपी देहरी के दरवाजे पर, यदि सतत विराजमान हो तब लोकालोक की प्राप्ति सहज ही हो जाय। संसार का गूढतम रहस्य प्रकाशित हो जाय और समस्त सिद्धियाँ भी प्रकट हो जायें-

राम नाम मनि दीप धरि,
जीह देहरी द्वार ।
तुलसी भीतर बाहरेउँ,
जो चाहसि उजियार।।

जाना चहहिं गूढ़ गति जेऊ।
नाम जीह जपि जानहिं तेऊ।।
साधक नाम जपहिं लय लाये।
होहिं सिद्ध अनिमादिक पाए।।

भगवान् कृपा करें जिससे सतत नाम-स्मरण चलता रहे, क्योंकि यही भगवान् अपने श्रीकृष्णावतार में ‘ माम् अनुस्मर युध्य च’ कहकर संसार के जीवन युद्ध को जीतने का रहस्य प्रकट करते हैं।

।। हरिः शरणम्।।

https://shishirchandra.com/2019/09/25/नाम-महाराज-की-वन्दना/

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Author: Prof. Shishir Chandra Upadhyay

I am Professor of Sanskrit subject in K.B.P.G College, Mirzapur, Uttar Pradesh, India, since 1991.

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