मुक्तसङ्गः समाचर।

गीता के तीसरे अध्याय में भगवान् एक बड़ी बात कहते हैं। यह बात सभी मनुष्यों हेतु कही गई है- मुक्तसंग(आसक्ति) से मुक्त होकर आचरण करो।
पूरा श्लोक है-
यज्ञार्थात् कर्मणः अन्यत्र,
लोकः अयं कर्मबन्धनः।
तदर्थं कर्म कौन्तेय,
मुक्तसङ्गः समाचर।।
भावार्थ ये है कि- यज्ञ यानी कि – यज्ञः वै विष्णुः( भगवान्) के प्रीत्यर्थ(तन्निमित्त) कर्मो के सिवाय किए गए अन्यत्र कर्म ही संसार बन्धन के कारण होते हैं। कामना सक्त या फलासक्त होकर जब कर्म किए जाएंगे तो वह निश्चित रूप से जन्ममृत्यु के चक्कर में डाले रहेंगे। अतः यज्ञार्थ अथवा भगवदर्पण बुद्धि से कामनाओं से अनासक्त होकर कर्म किया जाना चाहिए।
विशेष ध्यान यह भी रहे कि संग(आसक्ति)मतलब कि विषयासक्ति से मुक्त रहते हुए ,प्रत्येक मुक्तिकामी मनुष्य को आचरण करना चाहिए। गीता के उक्त सन्देश से सम्बन्धित एक प्रसिद्ध पौराणिक आख्यान आता है।

यह आख्यान सती मदालसा का है।विभिन्न आख्यानों के अनुसार मदालसा को कुल चार पुत्र हुए थे। जब प्रथम तीनों पुत्र सन्यासी हो गये , तब चौथे पुत्र की उत्पत्ति के पूर्व उनके पति ने सती से आग्रह किया कि चौथा पुत्र ऐसा होना चाहिए, जो हमारा उत्तराधिकारी बन सके ,नहीं तो राज्य-कार्य कैसे चलेगा। इस पर मदालसा ने अपनी सहमति व्यक्त की और पुत्र होने पर स्वयं उसके नामकरण की बात कही।
समयानुसार पुत्र होने पर मदालसा ने इस चतुर्थ पुत्र को सकाम शिक्षा देते हुए इसका नाम ” अलर्क ” रखा। बड़े होने पर अलर्क का राज्याभिषेक हुआ और उसने शासन संभाल लिया।
कालान्तर में कुसंगति से इनका राज्य छिन गया और ये जंगल में चले आये। यहीं अलर्क को अपनी माता द्वारा दिये गए यन्त्र की याद आई, जिसे माँ ने अत्यंत संकट में खोल कर देखने के लिए कहा था। जब यन्त्र खोला गया तो उसमें एक सूक्ति लिखी थी। जिसके अनुसार ,संग को
सब प्रकार से त्याग देना चाहिए।संग का मतलब यहाँ भी विषयासंग या फलासंग ही है। आगे का भाव ये है कि, यदि यह संग त्याग संभव न हो , तो यह आसंग साधुओं-सज्जनों से जोड़ देना चाहिए।क्योंकि वीतरागी साधुओं का संग तो इस मानवीय-जीवन के चरम लक्ष्य की परम औषधि है-
सङ्गः सर्वात्मना त्याज्यः,
स चेत् त्यक्तुं न शक्यते।
स सद्भिः सह कर्तव्यः,
सतां सङ्गो हि भेषजम्।।

अतः मनुष्य मात्र को भगवान् एवं भक्तिमती सती मदालसा के उक्त वचनों को आत्मसात् करते हुए श्रेष्ठ मानव जीवन के लिये मुक्तसंग होकर आचरण करना चाहिए। भगवान् एवं उनके प्यारे भक्तजन
अनुग्रह करें और अनासक्त मानव जीवन बन सके।

।। हरिः शरणम् ।।

http://shishirchandra.com/2019/08/12/मुक्तसङ्गः-समाचर।/

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Author: Prof. Shishir Chandra Upadhyay

I am Professor of Sanskrit subject in K.B.P.G College, Mirzapur, Uttar Pradesh, India, since 1991.

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