गावत नर पावहिं भव थाहा

कलिपावनावतर गोस्वामी जी का “मानस” एक ऐसा ग्रन्थ है ,जिसमें सारी समस्याओं का समाधान है। मनुष्य को मनुष्य बनाने और और इस शरीर के बाद पुनः अन्य शरीर का जन्म न हो, इस बड़े कार्य का अत्यन्त सरल उपाय सुझाया गया है।
बाबा ने बालकाण्ड से लेकर उत्तरकाण्ड तक अनेक चौपाइयों और प्रसंगों में भगवान् के नाम-लीला गुणों का स्मरण कलि-प्रभाव नाश और संसार मुक्ति के रूप में स्मरण किया है।
उत्तरकाण्ड में भगवन्नाम और गुणों का स्मरण करने पर संसार सागर से पार होने का प्रमाण उपस्थित करते हैं।
कलियुग केवल हरि गुन गाहा।
गावत नर पावहिं भव थाहा।।
भैय्या! प्रारम्भ में ही आदिपूज्य गणेशजी का स्मरण करते हुए नाम उच्चारण को उनकी आदि पूज्यता का कारण ही कह दिया है-
महिमा जासु जानि गनराऊ।
प्रथम पूजिअत नाम प्रभाऊ।।
भक्तश्रेष्ठ हनुमानजी महाराज ने तो भगवान् का नाम रटते-रटते जैसेउन्हें अपने वश में ही कर रखा है-
सुमिरि पवनसुत पावन-नामू।
अपने वश करि राखे रामू।।
नारायण! भगवान् किसी भी नाम का स्मरण मात्र तत्काल कष्टों से, विपत्ति से मुक्ति का सद्यः उपाय है, अनेकानेक पुराणों की अनेकानेक कथायें इस बात की साक्षी हैं। अरे भाई ! सज्जनों को इस बात स्वयं अनुभव करके देखना चाहिए कि नाम-जप कैसे दुःखभवसागर को ही सुखा देने में सर्वसमर्थ है-
नाम लेत भव-सिन्धु सुखाहीं।
सुजन विचार करौं मन माहीं।।
और क्या कहें इस कलिकाल में जब पूजा पाठ की विधि और सामग्रियां जब निर्दुष्ट नहीं रह गई हैं, तब नामाश्रय से बड़ा कोई उपाय नहीं।और क्या कहें नारायण भी अपने नाम का महत्व बता पाने में असमर्थ हो जाते हैं-
कहहुँ कहाँ तक नाम बड़ाई।
राम न सकहिं नाम गुन गाई।।
चहुँ जुग चहुँ श्रुति नाम प्रभाऊ।
कलि विशेष नहिं आन उपाऊ।।
एक जगह महाभाष्यकार पतञ्जलि ने किसी भी एक शब्द का सम्यक् अर्थ जानकर उसके समुचित प्रयोग को लोक और परलोक में परम कल्याण करने वाला बताया है, तब भगवन्नाम का जप स्मरण क्यौं नहीं उपकारी और मुक्तिकारी सिद्ध होगा?
नारायण! एक पुराण में चर्चा है कि एक ही बार श्रीभगवान् ” हरि ” के नाम के अक्षर द्वय का उच्चारण मनुष्य को मुक्ति का अधिकारी बना देता है-
सकृद् उच्चारितं येन,
हरिः इति अक्षरद्वयम्।
बद्धः परिकरः तेन,
मोक्षाय गमनं प्रति।।
और यदि कोई बार -बार अपराध करे और यह सोचे कि नाम का उच्चारण करके वह बारम्बार इससे मुक्त होता रहेगा, तो यह बहुत बड़ा नामापराध बनेगा, जिससे मुक्ति सद्यः सम्भव नहीं।
अतः भगवान् कीऔर सन्त-महात्माओं की कृपा बने ,जिससे नित्य निरन्तर श्री भगवान् के नामों का उच्चारण होता रहे, और नामाश्रयी नारदादि ऋषियों तथा भक्त श्रेष्ठ हनुमानजी महाराज की कृपा करुणा का पात्र होया जा सके।

।।हरिः शरणम्।।

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