ताहि भजन तजि भाव न आना

” मानस “ के सुन्दरकाण्ड में भगवान् और भक्त के अत्यन्त मार्मिक हृदय के मनोरम उद्गार यत्र तत्र सर्वत्र विकीर्ण हैं। और हो भी क्यों नहीं क्योंकि सुन्दरकाण्ड का सौन्दर्य भक्तिमती भगवती सीता और भक्तपरायण भगवान् की भावभूमि पर आधारित है।
यह भक्त और भगवान् की अद्भुत आत्मीयता है ,जब भगवान् के द्वारा लंका निर्दहन के बारे में पूछने पर हनूमान् जी कहते हैं कि –
सो सब तव प्रताप रघुराई।
नाथ न कछू मोर प्रभुताई।।
हे भगवन्! लंका जल गई उसमें मेरा क्या ,वह तो सब आपका प्रताप था मेरी कोई बड़ाई नहीं। और क्या कहूँ, उसके लिये अगम क्या है, जिस पर आपकी कृपा हो जाय, जैसे कि बडवानल को रूई भी जला सकती है-
तव प्रभाव बडवानलहि ,
जारि सकै खलु तूल ।।
इस पर भी हनुमान् जी महाराज भगवान् से अनपायनी(निश्चल) भक्ति का वरदान माँगते हैं और भगवान् भी ” एवमस्तु ” कह कर तत्काल अनुमोदन कर देते हैं।
इस घटना के बाद भक्त – भक्ति और भगवान् के स्व- स्वभाव पर सुन्दर काण्ड की बड़ी सुन्दर पंक्ति आती है-
उमा राम स्वभाव जेहि जाना।
ताहि भजन तजि भाव न आना।।
मतलब कि हे भगवती पार्वतीजी जो लोग भगवान् के अत्यन्त-अत्यन्त कोमलतम स्वभाव को जानते हैं ,उन्हें भजन-भक्ति के अतिरिक्त दूसरा भाव आ ही नहीं सकता।
भाव तो आध्यात्मिकता की आधारशिला ही है ,जिस पर भगवद्-भक्ति टिकी रहती है। भक्त और भगवान् को परस्पर ही समझा जा सकता है। और देवाधिदेव महादेव ने इसीलिए एक दूसरे प्रसंग में संसार को स्वप्नवत् और भजन-भाव को ही सत्य-सार -रूप कह दिया है-
उमा कहहुँ यह अनुभव अपना।
सत हरिभजन जगत् सब सपना।।

भगवान् और उनके भक्त कृपा करें और उनकी निश्चल भक्ति प्राप्त हो।

।।हरिः शरणम्।।

http://shishirchandra.com/2019/06/18/ताहि-भजन-तजि-भाव-न-आना/