संपत् नारायणस्मृतिः

संसार का ही नहीं प्रत्युत स्वर्गादि लोकों का भी श्रेष्ठ मानव शरीर , सांसारिक सुखों को ही महत्व बुद्धि से ग्रहण करता है। अब ऐसी स्थिति में जब उसे मालूम है कि एक के बाद एक अस्थिर संसार-भोगों और पदार्थों को प्राप्त करने और त्यागते रहने पर भी स्थायी सुख और आनंद की प्राप्ति अभी तक नहीं हुई। इसका कारण वह न खोजता है और खोजना चाहता है।
केवल सांसारिक सुखों की मृगमरीचिका में उसकी दशा उस भौंरे की तरह है जो रात बीतने और सुख के सुप्रभात और सूर्य की आशा में है। किन्तु हाथी रूपी काल का एक प्रहार ,उस कमल कोशी सुखान्वेशी भ्रमर पर ऐसा होता है कि, कि स्वयं नष्ट होकर, पुनः एक दूसरी योनि की यात्रा पर चल पड़ता है।और यही क्रम दुहराया जाता रहता है।विश्रांति और आनंद नहीं मिलता-

रात्रिः गमिष्यति भविष्यति सुप्रभातं
भास्वानुदेष्यति हसिष्यति पङ्कजालिः।
इत्थं विचिन्तयति कोशगते द्विरेफे
हा हन्त हन्त नलिनीं गज उज्जहार।।

अब वास्तविक बात तो यह है कि अविनाशी भगवान् का अंशमात्र यह जीवात्मा मनुष्य उस अविनाशी परमात्मा को छोड़कर, जिस विनाशी संसार में और उसके भोगों में सुखान्वेषण कर रहा है, वह वस्तुतः उसमें है ही नहीं।
वास्तविक बात तो यह है कि जब यह अविनाशी जीवात्मा विषयों और भोगों को ही सम्पत्ति और इन विषयसुखों के वियोग को विपत्ति मानता है, तब वह एक मानवीय और वास्तविक संपत्ति- सुखों से दूर ही रहता है।
निश्चित रूप से यदि विषय भोग के समय भी भगवद् स्मरण बना रहे,और यह स्मृति रहे कि सारे अनुभवों के मूल स्वयं परमात्मा हैं ,और यदि वे इस शरीर से हट जाँय ,तो कौन प्राणन की क्रिया करेगा?
कौन देखेगा? सुनेगा?
ऐसी स्मृति होते रहने पर संसार या संसारेतर कोई भी विपत्ति स्पर्श नहीं कर सकती-

दुख में सुमिरन सब करै,
सुख में करै न कोय।
जो सुख में सुमिरन करै,
तो दुख काहे को होय।

भगवान् श्रीराम ने सुन्दरकाण्ड में एक संकल्प ज्ञापित किया है कि यदि मन वचन और कर्म से कोई जीव सतत मेरा स्मरण बनाये, रखेगा तो बताओ प्रत्यक्ष क्या कहें, अप्रत्यक्ष-प्रत्यक्षवत् सपने में भी उस व्यक्ति को कोई विपत्ति नहीं आयेगी।
इसका अनुमोदन भक्तश्रेष्ठ हनूमान् जी महाराज तत्काल करते हुए कहते है कि-
हे भगवन् विपत्ति तो तभी है ,जब जिस काल में आपका स्मरण, भजन नही होगा।

कह हनुमन्त विपति प्रभु सोई।
जब तव सुमिरन भजन न होई।।

ऐसा ही संकल्प पुराण भी व्यक्त करते हैं।जब भगवान् व्यास जी उस विपत्ति को विपत्ति कहते हैं जब भगवान् का स्मरण नहीं होता।और संपत्ति तो उसी को कहते हैं, जब नित्य निरन्तर भगवद्स्मृति बनी रहती है-

विपदो नैव विपदः,संपदो नैव संपदः।
विपद् विस्मरणं विष्णोःसंपन्नाराणस्मृतिः।

अतः साधु, महात्मा और भगवत् प्रेमी भक्त कृपा करें , कि भगवत् स्मृति बनी रहे।

।।हरिश्शरणम्।।

http://shishirchandra.com/2019/05/24/संपत्-नारायणस्मृतिः/

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Author: Prof. Shishir Chandra Upadhyay

I am Professor of Sanskrit subject in K.B.P.G College, Mirzapur, Uttar Pradesh, India, since 1991.

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