यहाँ रोम रोम स्याम है

संसार में जो कुछ दीख रहा है, सब ब्रह्ममय है। हमारे वेदादि शास्त्र ऐसी ही दृढ बात व्यक्त करते हैं। संसार जो कुछ दृश्य है,वह प्रतिक्षण बदल रहा है, केवल एक जो नहीं बदल रहा है, वह सर्वकारण कारण एकमात्र परमेश्वर।
अब इस सर्वकारण कारण में जिसका मन लग जाय,सन्तकृपा या भगवन्त कृपा से , उसको तो किसी से कोई प्रयोजन नहीं, होगा-
हरि तजि किमपि प्रयोजन नाहीं।
ऐसे भगवत्प्रेमी का किसी से कोई न विरोध होगा और न ही भोग,मोक्ष या रिद्धि सिद्धि की कामना-
निज प्रभुमय देखहिं जगत केहि सन करहिं विरोध।।
और
चहौं न सुगति सुमति संपति कछु
रिधि सिधि विपुल बड़ाई।
हेतुरहित अनुराग रामपद बढ़ु अनुदिन
अधिकाई।।
अब भगवदनुरागी गोपियों की दशा भी ऐसी भगवद् दृष्टि मय हो जाती है कि वे किसी अन्य ईश्वर की कल्पना नहीं कर सकतीं, वे कहती हैं कि मनचोर ने हमारा मन चुरा लिया है , क्योंकि हमारी ही प्रार्थना पर जब से उन्होंने मेरी ओर देख क्या लिया है, हमको उनके सिवा कुछ दीखता ही नहीं-
मधुकर स्याम हमारे चोर।
मन हर लियो माधुरी मूरति
निरखि नयन की ओर।।
और परब्रह्म के पूर्णावतार श्रीकृष्ण की दृष्टि हो अथवा उनके प्रेमी भक्तों की , जब किसी जीवात्मा पर वह प्रेममयी करुणा दृष्टि पड़ जाये तो उसे जित देखूँ तित श्याममयी है और तो और – रोम -रोम श्याम ही सूझता है। भगवान् की कृपा के आकांक्षी को सभी ओर प्रभु ही दीखते हैं-

यो मां पश्यति सर्वत्र ।
सर्वं च मयि पश्यति।।
तस्याहं न प्रणश्यामि।
स च मे न प्रणश्यति।।

यही दशा दिशा भगवत् प्रेम में व्याकुल गोपी-मन की है, जिन्हे भगवान् के अतिरिक्त स्वयं अपने शरीर में अथवा और भी कहीं, दूसरा कोई सूझता ही नहीं-
स्याम तन स्याम मन स्याम है हमारो धन,
आठों याम ऊधो हमें स्याम ही सों काम है।
स्याम हिये स्याम हिये स्याम बिनु नाहिं तिये,
आँधे की सी लाकरी अधार स्याम नाम है।
स्याम गति स्याम मति स्याम ही है प्रानपति
स्याम सुखदाई सों भलाई सोभाधाम है।।
ऊधो तुम भये बौरे पाती लै के आए दौरे,
जोग कहाँ राखैं यहाँ रोम रोम स्याम है।।

सन्त भगवन्त कृपा करैं और ऐसी दृष्टि प्राप्त हो जाये।

।।हरिः शरणम्।।

http://shishirchandra.com/2019/05/01/यहाँ-रोम-रोम-स्याम-है/

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Author: Prof. Shishir Chandra Upadhyay

I am Professor of Sanskrit subject in K.B.P.G College, Mirzapur, Uttar Pradesh, India, since 1991.