सत्संगति संसृति कर अन्ता

सत्संगति से जन्म-मृत्यु रूप चक्र का विनाश होगा। क्योंकि असत्संगति से तो असद् रूप संसार में ही आने जाने का क्रम चलता रहता है। तब यह मान लिया जाय कि सत्संगति से ही मुक्ति होगी।
अब प्रश्न होता है कि सत् की संगति कैसे हो? तब इसका सरल उत्तर है कि जो सत् के मार्ग पर चलने वाले साधु ,सज्जन, सन्त,महात्मा, सद्गुरु हों ,उन्हीं की शरण लेनी होगी। इन्हीं सन्तों का सामीप्य मुक्ति का सर्वात्मना साधन है।
अब प्रतिप्रश्न होता है कि वे कौन से कारण अथवा उपाय हैं, जिनसे ऐसे स्वयं मुक्तात्मा विमलात्मा पुरुषों का साहचर्य हो।
तब इसका उत्तर श्रीमदाद्य शङ्कर देते हुए स्वीकारते हैं कि ऐसे सद्गुरुदेव की प्राप्ति और मुक्ति अनेकानेक जन्मों में अर्जित पुण्यों द्वारा सम्भव है-

मुक्तिः नो शतकोटि जन्मसु कृतैः
पुण्यैः विना लभ्यते।।

सैकड़ों-करोड़ों जन्मों में एकत्रित होती हुई सदाचार सम्पनता द्वारा, जब इसकी परिपूर्ण और परिपक्वावस्था आती है ,तब जाकर सन्त-सद्गुरु-मिलन और मुक्ति हो पाती है।
उत्तरकाण्ड में बाबा तुलसी अपने उपास्य भगवान् श्रीराम के श्रीमुख से यही सिद्ध करते दीखते हैं, जब भगवान् कहते हैं-
पुण्य-पुंज बिनु मिलहिं न सन्ता।
सत्संगति संसृति कर अन्ता ।।
इन सभी बातों को समझने में एक तत्व और प्रकट होता है, जब एक दूसरा कारण भी ,सन्त- सद्गुरु की प्राप्ति का उसी जगह दीखता है। वह दूसरा कारण है- श्रीभगवान् हरि की कृपा-
अब मोहिं भा भरोस हनुमन्ता।
बिनु हरि कृपा मिलहिं नहिं सन्ता।।

” मानस ” के सुन्दरकाण्ड में हनुमान् जी से विभीषण का कथन है, कि उन्हे यह विश्वास हो गया कि बिना भगवत्कृपा के हनुमान् जैसे तत्वज्ञ सन्त का मिलन सम्भव नहीं है।
उक्त सन्दर्भों में कोई विरोध नहीं, क्योंकि जब सदाचार-सम्पन्न जीवन होगा तभी विवेक की पुष्टि होगी ,और जहाँ विवेक की पुष्टि का कारण भी सत्संग है,वहीं रामकृपा का आश्रय सन्त सद्गुरु की कृपा दीखती है-

बिनु सतसंग विवेक न होई।
राम कृपा बिनु सुलभ न सोई।।
और –
जब द्रवैं दीनदयाल राघव साधु संगति पाइये।
इस तरह पुण्यार्जन से यदि सद्गुरु प्राप्ति को माना जाय तो इसका मतलब है कि, हमें स्वयं चल कर अन्वेषण पूर्वक सन्त के पास जाना होगा। और सन्त स्वयं चल कर मुक्ताकांक्षी के पास पहुंचें , तो हरि-कृपा।
इसमें यह बात दृढतर होती है कि बिना पहुंचे हुए सन्त- सद्गुरु की शरण ग्रहण किए कौन है ,जो बद्ध-जीव को उस पार पहुंचा दे,जहाँ माया का घेरा नहीं और संसृति-संसार का अँधेरा नहीं।
अतः श्रीमदाद्य शङ्कर की वाणी से विराम लेता हूँ, जहाँ सन्त-शिरोमणि के चरण-शरण में मुक्ति लिखी है-

सन्तं महान्तं समुपेत्य देशिकं,
तेन उपदिष्टार्थ- समाहितात्मा।।

।।हरिश्शरणम्।।

https://shishirchandra.com/2019/04/19/सत्संगति-संसृति-कर-अन्ता/

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Author: Prof. Shishir Chandra Upadhyay

I am Professor of Sanskrit subject in K.B.P.G College, Mirzapur, Uttar Pradesh, India, since 1991.

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