चैत्र शुक्ला प्रतिपदा विक्रम संवत् 2076 का आज का दिन हिन्दू नववर्ष का प्रथम दिवस है, जब विधाता ने सृष्टि की संरचना पूर्व-पूर्व के अनेक” कल्पों “की भाँति प्रारम्भ करने का संकल्प लिया-
” धाता यथा पूर्वम् अकल्पयत् “
आज हम सभी परस्पर मंगलकामी होकर भगवद्-भाव और वस्तुतः भगवत्-सम्बन्ध की स्मृति के आलोक में आर्ष-वाणी का जयघोष लिए “वसुधैव कुटुम्बकम् “ की भावना से पौनःपुन्येन मंगल की आशंसा कर रहें हैं।इन सभी मंगलों के मूल में मुझे अपने पिता का स्मरण हो रहा है।वे कहते थे कि संसार में मंगल का आदान-प्रदान तभी सम्भव है, जब जीवन में शुचिता और सदाचार-सम्पन्नता आ जाए।इस सदाचार सम्पन्नता और शुचिता का सम्बन्ध कमाए हुए धन से है। वे एक सिद्धांत वाक्य कहा करते थे- अर्थे शुचिः स शुचिः।
मतलब कि अर्जित किए जाने वाला धन भी वैदिक सदाचार पूर्वक हो ,क्योंकि जीवन में पवित्रता(शुचिता)का आधार और आधान तभी संभव है, जब वह धन अन्यायोपार्जित न हो। अर्थ की शुचिता नहीं होगी,तो यह स्वयं और आनेवाली पीढियों पर भी भारी पड़ेगा।अतः मनुष्य मात्र को इस पर बहुत ध्यान देना चाहिए।
उनकी उक्त अर्धाली आर्ष है,जिसे इस प्रकार समझना चाहिए-सभी प्रकार की पवित्रता(शुचिता)में अर्थ(धनसंपत्ति)
की शुचिता सर्वश्रेष्ठ है।जो अर्थ को न्याय पूर्वक पवित्र भाव से अर्जित करता है, वह पवित्रतम है।मिट्टी-पानी और साबुन से होनेवाली पवित्रता तो वाह्य शरीर की शुद्धि मात्र है-
सर्वेषामेव शौचानाम् अर्थशौचं परं स्मृतम्।
योर्थे शुचिः स शुचिः न मृद्वारिशुचिः शुचिः।
वस्तुतः धृति-क्षमा-दम-अस्तेय-शौच-इन्द्रियनिग्रह-धी-विद्या-सत्य और अक्रोध आदि दश-धर्म-लक्षणों में पंंचम स्थानी यह शौच शब्द मानव जीवन के लिये अत्यंत और अत्यंत ही महत्व का है।
मित्रों! शुद्ध एवं सात्विक तरीकों से अर्जित धन से वाह्याभ्यन्तर शुचिता प्राप्त होगी अन्यथा नहीं।
इस सम्बन्ध में महाभारत में एक प्रसंग आता है, जहाँ ” भीष्म पितामह ” ने इस अर्थ की उत्कृष्टता और निकृष्टता की चर्चा की है।वे कहते हैं- मनुष्य तो अर्थ का दास है।अर्थ किसी का दास नहीं।ऐसा समझ कर हे महाराज! मैं भी अर्थ से बँधा हूँ।मुझे कौरवों ने इसी कारण से बाँध रखा है।यह अर्थ का ही दोष है कि मेरी बुद्धि भी मलिन हो गई है-
अर्थस्य पुरुषो दासः,दासः तु अर्थो न कस्यचित्।
इति मत्वा महाराज ,बद्धः अस्मि अर्थेन कौरवैः ।।
पितामह इसी अर्थ को कोस रहे हैं, जो कौरव-राज और राज्य से प्राप्त है, क्योंकि इसी से उनकी बुद्धि विकृत हो गई।और द्रौपदी के चीरहरण जैसे जघन्य कर्म को भी देखना और सहना पड़ा।
इस प्रकार हम सभी को इस मानव रूप में और मानव जीवन में भगवत्-प्रीतिपूर्वक
भगवदर्पण बुद्धि से विवेक तथा न्याय से अर्थोपार्जन करना श्रेष्ठ है।और इसमें काल
कर्म-स्वस्वभाव के गुणों की भी महत्तर भूमिका है, जिससे जीव यन्त्र वत् माया के पति का ध्यान नहीं करता हुआ केवल माया( धन-सम्पत्ति)के येन केन प्रकारेण उपार्जन मे लगा रहता है। जब तक किसी सन्त-महात्मा, परंसिद्ध साधक की करुणा पूर्ण दृष्टि इस जीव पर नहीं पड़ती, तब तक कामनाओं(अर्थों) का दास बना हुआ यह मानवाकृति मनुष्य- गतागतं कामकामा लभन्ते – को चरितार्थ करता रहता है।
नारायण! माया का पर्दा ही ऐसा है, जो उसे अपनी आवरण और विक्षेप शक्तियों के अधीन करके मोह-पाश में जकड़ कर सारे अर्थों में अशुद्ध (अशुचि) किये हुये है। और इससे छुड़ाए कौन?
तो – तुलसिदास यह जीव मोह-रजु जो बाँधे सोइ छोरै।
कल के दिन हमारे मलूकपीठ वाले सद्गुरु आचार्य राजेन्द्रदास जी महाराज इसी सन्दर्भ में मलूकदास जी के एक दोहे का स्मरण कर रहे थे। भाव यों था कि मायिक कष्टों से निवृत्ति के लिये जीव को बड़ी सावधानी से ” माया ” नहीं ,वरन् मायाधीश की अनन्यशरण ग्रहण करनी होगी ,और तब तो मायाका आवरण छिन्न हो जायेगा तथा वह स्वयं चेरी(दासी) बन जायेगी, जिससे ” अर्थ ” की शुचिता और अशुचिता का निरास उस ” महारास ” के ” रस ” में डूब जाने पर ” भाव ” की परम परम दशा में सुलभ हो जायेगा-
माया को सब कोइ भजै, माधव भजै न कोय ।
माया तजि माधव भजै, तो माया चेरी होय ।।
।। हरिश्शरणम् ।.