भक्ति और उसके पाँच काँटे

ज्ञान, कर्म और भक्ति को शास्त्र और सन्त महात्मा मुक्ति का साधन मानते हैं। इन सभी को सरलतया समझें तो कर्म का मतलब जहाँ भगवदर्पण बुद्धि से किया जाने वाला कार्य है , तो ज्ञान का अर्थ परमात्म अनुभव और भक्ति माने आत्मा का अनुभव।

आत्मानुभूति भक्ति, परमात्मा की अनुभूति ज्ञान और परार्थकृत कर्म को कर्म संज्ञा दी जा सकती है।
मुक्ति के इन त्रिविध साधनों में अत्यंत सहज और महत्वपूर्ण साधन भक्ति ही है।

मोक्षकारणसामग्र्यां भक्तिरेव गरीयसी।
स्वस्वरूपानुसन्धानं भक्तिरित्यभिधीयते।।

ऐसा विचार व्यक्त करने वाले आचार्य शङ्कर ने एक बड़ी बात इस सन्दर्भ में. और कही है कि, इस भक्ति की प्राप्ति में अत्यन्तात्यन्त समस्या अहंबुद्धि है,जो इस बन्धन से मुक्त नहीं होने देती।वे कहते हैं कि, जब तक अहंकार की शक्ति बढ़ी-चढ़ी रहती है, तब तक कोई विद्वान् उसका सहसा नाश भी नहीं कर सकता, क्योंकि जो पुरुष निर्विकल्प समाधि में अविचल-भाव से स्थित हो गए हैं उनमें भी अनन्तानन्त जन्मों के प्रारब्ध वश और अक्षीण वासनावश अहं निवृत्ति कठिन है।

आरूढ -शक्तेः अहमो विनाशः
कर्तुं न शक्यः सहसापि पण्डितैः।
ये निर्विकल्पाख्यसमाधि-निश्चलाः
तान् अन्तरानन्तभवा हि वासना।।

इस अहंकार को पाँच प्रकारों में सन्त जन बाँटते हैं, जो कि भक्ति-मार्ग के पाँच बड़े-बड़े काँटे हैं, इनकी निवृत्ति के बिना स्वस्वरूपानुसन्धान या भक्ति सम्भव नहीं है।और भक्ति के बिना मुक्ति कहाँ?

ये पाँच काँटे इस प्रकार हैं-

जातिः विद्या महत्वं च,
रूप -यौवनम् एव च।
पञ्चैते यत्नतः त्यज्याः।
एते वै भक्तिकण्टकाः।।

जात्याभिमान, विद्याभिमान, पद या ऐश्वर्य वश होने वाला महत्वाभिमान,रूपाभिमान एवं यौवनावस्था का अभिमान।
और इसकी मीमांसा करें तो ये बातें केवल और केवल देहाभिमान वश होती हैं। यह प्राप्त हुई देह प्रारब्धानुसार है अथवा भगवत्कृपा वशात्।
इन सबके अतिरिक्त प्राप्त हुई आयु, कर्म(व्यवसाय), वित्तादि, विद्या और मृत्यु का देश-काल-प्रकार, यदि प्रारब्ध वशात् गर्भस्थ शिशु में जन्म-पूर्व ही निश्चित हो जाते हैं, तब अभिमान क्यों?

आयुः कर्म च वित्तं च विद्यानिधनमेव च ।
पञ्चैतान्यपि सृज्यन्ते गर्भस्थस्यैव देहिनः।

अतः सन्त-भगवन्त का आश्रय लेते हुए भक्ति की प्राप्ति और तत्प्राप्ति से मुक्ति की पुष्टि करणीय है।

।।हरिश्शरणम्।।

https://shishirchandra.com/2019/03/10/भक्ति-और-उसके-पाँच-काँटे/

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Author: Prof. Shishir Chandra Upadhyay

I am Professor of Sanskrit subject in K.B.P.G College, Mirzapur, Uttar Pradesh, India, since 1991.

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