गुरुमुख होना

बचपन से ही एक बात सुनता आ रहा हूँ, अमुक गुरुमुख हो गये और अब ध्यान भजन पूजन ही उन गुरुमुख सज्जन का अभिन्न अंग है। निरन्तर गुरुमुखता की यह बात सुनते-सुनते बड़ा लम्बा कालखण्ड अखण्ड ब्रह्माण्ड का अविकल कालांश बन चुका है। और बचपन से अब तक की प्रौढ अवस्था तक इस रहस्यपूर्ण गुरुमुख होने के अर्थ में बड़ा परिवर्तन भी हो चुका है।लेकिन बचपने में इसका जो एक मौलिक अर्थ समझ में आया वह परम और परम लक्ष्य यही लगा था कि इसका मतलब है जीवन से मुक्ति।
यह जीवन्मुक्तता आखिर में है क्या? तो लगता है कि तब और अब के ज्ञान का परिमार्जन होकर एक ऐसी दृष्टि और दृढतर बुद्धि का विकसन ,जिससे भेद मिट जाय, यही कहीं जीवन्मुक्तता तो नहीं। और यही सही भी है।यह सारी मुक्ति का दायक गुरु ही है, जिसकी कृपा से या गुरुमुखता से यह जगत् ही जगत् नाथ के रूप में दीखने लगता है।
अच्छा, रहा गुरुमुख होने का अर्थ, तो वह अत्यन्तात्यन्त और सर्वसाधारण है,जो मेरे मन में आता है। मतलब कि जो विषयी जीव, विषय-मुख अर्थात्-
शब्द-स्पर्श-रूप-रस-गन्ध-मुख है वह इनमें और इनसे विरत होकर परमानन्द के अविच्छिन्न स्रोत परम ज्ञान-स्वरूप ” गुरु ” की ओर अभिमुख हो जाय। और यह गुरु दूसरा कोई नहीं, बल्कि स्वयं परमात्मा ही है। वस्तुतः संसाराभिमुख और विषयवश नीचे और नीचे की सीढ़ी पर फिसलते हुए जीव पर किसी गुरु-भगवान् की करुणा पूर्ण दृष्टि पड़ जाय, तो उसे विवेकानंद बनने में देर भी नहीं।
हमारे सत् शास्त्र इस गुरुमुखता और तत् कृपा से प्राप्त स्वरूप को अद्वितीय एवं वैकुण्ठ-दुर्लभ कहते हैं-

चिन्तामणिः लोकसुखं सुरद्रुः सर्वसम्पदम्
प्रयच्छति गुरः प्रीतःवैकुण्ठं योगिदुर्लभम्।।

और गुरुमुखता से प्राप्त होने वाली अनेकानेक सिद्धियों की चर्चा टीकाकार वंशीधर जी ने की है ,जो इस प्रकार है-

सत्कीर्तिः विमलं यशः
सुकविता पाण्डित्यम् आरोगिता।
वादे वाक्पटुता कुले चतुरता
गाम्भीर्यम् अक्षोभिता।
प्रागल्भ्यं प्रभुता विधौ निपुणता
यस्य प्रसादेन वै।
तं वन्दे शिवरूपिणं निजगुरुं
सर्वार्थ-सिद्धि-प्रदम्।।

और इस गुरुमुखता और गुरुप्रसादता का आनन्द कहाँ तक कहें, अनेक उक्तियाँ हैं।
वाणी यहीं विरमती है-

हरौ रुष्टे गुरुः त्राता, गुरौ रुष्टे न कश्चन।
तस्मात् सर्वप्रयत्नेन गुरुमेव प्रसादयेत्।।

।।हरिश्शरणम्।।
http://shishirchandra.com/2019/02/23/गुरुमुख-होना