आत्मा की अनुभूति

आत्मा की अनुभूति का विचार आने पर एक अद्भुत आनन्द की लहर दौड़ जाती है। यह मानव जीवन इसीलिये मिला भी लगता है कि इसी शरीर( पिण्ड ) से ही आत्मानुभूति हो जाये।

यह जीवात्मा ही आत्मानुभूति यानी कि परमात्मा की अनुभूति कर भी सकता है।और उसकी अनुभूति स्वात्मा का ही विषय है, क्योंकि वस्तुतः दोनों एक ही हैं। एक परमात्मा अंशी है और दूसरा जीवात्मा उसका अंशमात्र।
दोनों की तुलना करने पर बहुत सूक्ष्म भेद प्रतीत होता है-
यह जीवात्मा एक असीम वृत्त में है, जिसकी परिधि कहीं नहीं है। लेकिन इसका केन्द्र एक स्थान में निश्चित है। इसी प्रकार परमात्मा भी एक असीम वृत्त है,जिसकी भी परिधि कहीं नहीं है। जीवात्मा का केन्द्र जैसे एक स्थान में निश्चित है, लेकिन इसका कोई केन्द्र निश्चित नहीं।वस्तुतः इस परमात्मा का केन्द्र सर्वत्र है।
और इसीलिये यह परमात्मा सभी हाथों द्वारा काम करता है, सभी नेत्रों द्वारा देखता है, सभी पैरों द्वारा चलता है, सभी शरीरों द्वारा श्वाँस-प्रश्वाँस करता है, सभी जीवों में वास करता है, सभी मुखों द्वारा बोलता है और सब मस्तिष्कों द्वारा विचार भी करता है- सर्वतोक्षिशिरोबाहु… इत्यादि श्रुति वाक्य प्रमाण हैं-
सहस्रशीर्षापुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात्।
स भूमिं स्पृत्वात्यतिष्ठद् दशांगुलम्।।

इत्यादि वेद वाक्य भी उसी परमात्मा की अनन्तता के प्रमाणपत्र हैं, जिसका अंशी यह जीवात्मा है। यदि यह जीवात्मा भी अपनी आत्म चेतना को अनन्त गुनी कर ले ,तो यह भी परमात्म स्वरूप प्राप्त कर सकता है, यानी कि आत्मानुभूति कर सकता है।
अब शरीर में उस परमात्मा का वास उक्त श्रुति से हृदय देश में अंगुष्ठ प्रमाण सिद्ध है, ऐसा इसके अन्यतम भाष्यकारों -सायणाचार्य एवं उव्वट-महीधर आदि ने व्यक्त किया है।
सर्वशास्त्रमयी गीता – सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टः (15/15) और – ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेर्जुन तिष्ठति( 18/61) भी परम आत्मा को हृदय देश में विराजमान मानती है।
अब जब ईश्वर हृदय देश में विराजित है, तब हृदय को ही महत्व देते हुए इसी के परि संस्कार और परिशुद्धि की आवश्यकता है। बुद्धि के परिसंस्कृत होने पर सैकड़ों विज्ञानों का आविष्कार हुआ है और आगे, प्रायः भोग-सामग्रियाँ ही एकत्रित होती रहेंगी, जिनसे नानात्व में विचरते हुए, भटकाव ही सम्भव है।
अन्तिम ध्येय तक पहुँचाने की क्षमता हृदय में ही है।बुद्धि द्वारा अगम्य विषय तो शुद्ध हृदय ही देख सकता है।जिसका हृदय स्फूर्तिमय हो जाता है वह सर्व हृदय की बातें जान सकता है, जहाँ तर्क और बुद्धि कभी भी नहीं पहुंचे हैं।
स्वामी विवेकानंद जी ने कहा कि आत्मा की अनुभूति का पढ़े लिखे होने से कोई मतलब नहीं है।वे कहते हैं-
यदि तुम किसी का प्राण लेना चाहो तो,तुम्हें ढाल-तलवार आदि शस्त्रों से सज्जित होना होगा।परन्तु आत्महत्या करनी हो तो केवल सुई ही पर्याप्त है।इसी तरह यदि दूसरों को सिखलाना हो तो बहुत सी बुद्धि और विद्वत्ता की आवश्यकता होगी, किन्तु आत्मानुभूति के लिए यह आवश्यक नहीं है।इसके लिये तो हृदय-शुचिता आवश्यक है।और जिनका हृदय शुद्ध है, वे धन्य हैं, क्योंकि उन्हें आत्मा का अनुभव अवश्य होगा।”
श्रीमदाद्य भगवत्पाद शङ्कर इस बात में एक युक्ति देते हैं।वे कहते हैं कि किसी भी तरह की भूख-प्यास, चिन्ता, आरोग्य, कष्ट, दर्द, रोग, बन्धन-मोक्ष आदि का अनुभव तो अपने आप स्वयं ही को होता है, दूसरों द्वारा उनका ज्ञान तो आनुमानिक ही है। इसी तरह आत्मा की अनभूति तो अपने हृद्देश में विराजित आत्मा में ही ऐदंप्राथम्येन सम्भव है-

बन्धो मोक्षः च तृप्तिः च,
चिन्तारोग्यक्षुधादयः।
स्वेनैव वेद्याः यज्ज्ञानं,
परेषाम् आनुमानिकम्।।
– विवेकचूडामणि- 476 ।
इसलिये संसार के भोगमात्र का भोग ही न करने हेतु जन्मे इस मनुष्य को आत्मा की अनुभूति इसी शरीर से इसी जन्म में सभ्भव है।और यदि -नर तन पाइ विषय मन देहीं की स्थिति बनी रहती हैं तो पलटि सुधा ते शठ विष लेहीं भी अवश्यंभावी है।
भगवत्पाद शङ्कर भी इसी की पुष्टि करते दीखते हैं, जब वे कहते हैं कि ,जो लोग आराममय और विलासिता पूर्ण जीवन की इच्छा रखते हुए आत्मानुभूति की चाह रखते हैं, वे सभी उस मूर्ख के समान हैं, जिसने नदी पार करने के लिए एक मगर को लकड़ी क लट्ठा समझ कर पकड़ लिया है। वह मगर उसे अवश्य ही खा डालेगा नदी पार करने की बात तो बहुत दूर है-

शरीरपोषणार्थी सन्,
य आत्मानं दिदृक्षति ।
ग्राहं दारुधिया धृत्वा,
नदीं तर्तुं स इच्छति।।
– विवेकचूडामणि-86।
इस तरह आत्मा की अनुभूति तो विशुद्ध हृदय में ही साक्षाद् की जा सकती है।वह नित्यबोध, स्वस्वरूप, केवलानंद रूप, निरुपम, कालातीत, नित्य मुक्त, निश्चेष्ट, आकाशवद् निःसीम, निष्कल,निर्विकल्प, परमात्मा पूर्ण मनोयोग से हृल्लीन दशा में आत्मा द्वारा अनुभूत हो रहा है।और जिन्हें यह अनुभव हो गया, उनके आनंद की कोई सीमा नहीं-

किमपि सततबोधं केवलानन्दरूपं,
निरुपम-मतिवेलं नित्यमुक्तं निरीहम्।
निरवधि गगनाभं निष्कलं निर्विकल्पं,
हृदि कलयति विद्वान्ब्रह्म पूर्ण समाधौ।।

– विवेकचूडामणि- 409 ।

।।हरिश्शरणम्।।

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Author: Prof. Shishir Chandra Upadhyay

I am Professor of Sanskrit subject in K.B.P.G College, Mirzapur, Uttar Pradesh, India, since 1991.

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