प्रवर्तनं प्रवृत्तिः किसी संसार व्यापार में प्रवृत्त होना या लगना प्रवृत्ति है। इन्द्रियादि के वशीभूत होकर उनके विषयों में जीव का अनेक शरीरों में संचरण निरन्तर चलने वाली प्रक्रिया है।यही नैसर्गिक गति भी है। किन्तु अनेकानेक जन्मों से गतिशील यह प्रक्रिया एक न एक दिन तो अवश्य ही मानवीय वेदना और चेतना को को यह समझने के लिये मजबूर करती है कि आखिर यह गतानुगतिको लोकः न लोकः पारमार्थिकः की वस्तुस्थिति क्या है।
हालाँकि सनातन धर्मावलंबियों में यह बात बड़ी विधिक रूप से रखी गई है जिसमें मानवीय आयु को एक सौ वर्षों का होना कहा जाता है- जीवेम शरदः शतम्।
और वेदादि शास्त्र जीने ही नहीं बल्कि सोचने, समझने, सुनने और बोलने की शक्ति रहने के लिए बारम्बार ईश्वर से प्रार्थना करते दीखते हैं। यह तो हुई प्रवृति की बात, जिसमें सत् शास्त्रों और सद् गुरुजनों के निर्दिष्ट आचरणों पर चलते रहने से मन की वृत्ति एक ऐसे मुकाम पर आ जाती है कि आखिर यह कब तक?
और इसी संसारी प्रवृत्ति से ऊब कर यहीं, इसीके एक छोर से प्रारम्भ होता है, निवृत्ति का पथ। जगत् के भोग से वितृष्ण होने और जगत् को ही कृष्ण मान लेने की दृष्टि यदि भगवान् या उनके प्यारे भक्तों की कृपा से मिल जाय, तो यही तो निवृत्ति है।
इस निवृत्ति मार्ग पर चलने की हमारी सनातनी व्यवस्था का स्मरण ब्रह्माण्ड के परम शिक्षक सोलहवें अध्याय में करते हैं-
प्रवृतिं च निवृत्तिं च,
जनाः न विदुः आसुराः।
न शौचं नापि च आचारः,
न सत्यं तेषु विद्यते ।।
अब सोचिए किसमें प्रवृत्त होया जाय और किससे निवृत्त, यह आसुरी भाव यानी कि रजोगुणी और तमोगुणी लोग नहीं जानते।
ऐसे लोगों में पवित्रता नहीं और सत्य परायणता भी नहीं।
बचपन में एक श्लोक पढ़ा करते थे-
अकृत्वा परसन्तापं अगत्वा खलमन्दिरम्।
अनुल्लंघ्य सतां मार्गं यत् स्वल्पमपि तद् बहु ।।
दूसरों के आनंद, सुख, वैभव को देख कर कोई द्वेष नहीं करना क्योंकि यह तो अपने अपने प्रारब्धवश उस परं का ही वैभव है ,इससे कुण्ठा क्यों? और यह भाव आए विना वैकुण्ठ की प्राप्ति भी असंभव ही है। दुर्जनों के मध्य न जाना , सदाचरण की प्रवृत्ति न छोड़ कर ,जो थोड़ा भी बने ,वही बहुत है।
अब सोचें तो प्रवृत्ति मार्ग यानी कि कर्मकाण्ड का व्यापक उपदेश हमारे वेद शास्त्र करते हैं, जिसमें अमुक -अमुक कामनाओं की प्राप्ति हेतु भिन्न-प्रभिन्न विधियाँ सनातन काल से चली आ रही हैं।
रही निवृत्ति की बात, तो यह तो वेदों के अन्तिम भाग वेदान्त शास्त्र का विषय है, जिसे ज्ञानकाण्ड भी कहते हैं।
यह निवृत्ति विषयक चर्चा बहुत थोड़ी है।
लेकिन अपनी ऊपर की बात का सन्दर्भ लें , तो उसमें एक मनुष्य की सौ वर्ष की आयु में चार आश्रमों का प्रतिपादन है।
इसे पचीस-पचीस वर्षों में बाँटा गया है-
प्रथम आश्रम ब्रह्मचर्य आश्रम है, जिसमें गुरु के समीप जाना(उपनयन)है।
यहीं गुरुकृपा से वेदारम्भ होता है, जिससे आत्मा -अनात्मा का विचार सुदृढ हो जाता है। आगे संसार की रक्षा और सृष्टि की प्रक्रिया जारी रखने या वंश परम्परा को सुरक्षित रखने के लिए समावर्तन संस्कार होता है, जिससे गुरु आज्ञप्त होकर विवाह-संस्कार और पचीस वर्ष की गृहस्थ आश्रम परिपाटी पूरी होती है।
यही वह गृहस्थ आश्रम है, जो अन्य सभी तीनों का आधारभूत है-धन्यो गृहस्थाश्रमः।
क्योंकि इसके बिना तो किसी आश्रम की कल्पना भी सम्भव नहीं ।
इसके बाद का तृतीय आश्रम है, वानप्रस्थ, इसमें वनवासी-गिरिवासी की तरह अत्यंत अल्प आवश्यकता रखते हुए जीवन निर्वाह का व्रत पालन करना होता है । इसीमें गृहस्थोत्तर पचास वर्ष से आगे की व्यवस्था वन में निवास करते हुए तन्निष्ठ आचरण, कम से कम आवश्यकताओं से सरोकार रखने वाली
होती है, चाहे वन में जाकर हो अथवा कहीं भी रहकर। वस्तुतः वानप्रस्थी पना एक भाव है, यदि वन में जाकर भी संसार निवृत्ति नहीं, तो गृहस्थ ही ठीक।
साधु परम्परा में कहते हैं कि यह पचास से पचहत्तर का वानप्रस्थ तो पचास से आगे की गिनती ही संकेत कर देती है-
हर एक गिनती आगे जाने पर-
इक्यावन, बावन ,तिरपन ,चौवन,पचपन, छप्पन, सत्तावन और अठ्ठावन तक कम से कम पाँच बार वन -वन की प्रवृत्ति होती जाती है। मतलब कि पचास से आगे की गिनती में सात-आठ साल तक तो चलेगा,लेकिन उससे आगे नहीं-
क्यों? क्योंकि उससे आगे की गिनती तो सीधे शठ (दुष्ट) ही सिद्ध कर देगी-
उनसठ, साठ इकसठ, बासठ, तिरसठ, चौंसठ, पैंसठ, छासठ, सतसठ, अठसठ।
इससे आगे भी ख्याल नहीं तो वह डुबो तो देगा ही- उनहत्तर, सत्तर आदि ।
इस प्रकार पचास से पचहत्तर तक यदि भव सागर से तर (डूब) कर पार करके आगे इससे निकलने की प्रवृत्ति नहीं उपजी तो तर (डूब) ही जाना है।
मतलब कि पचहत्तर से आगे सौ वर्ष की आयु सन्यास आश्रम है, जहाँ सर्व कर्म सन्यास यानी कि एषणा त्रय( सुत-वित-लोक) त्याग ही ध्येय बन जाता है।
यही चतुर्थाश्रम और अन्तिम आश्रम है। यही निवृत्ति या वेदों के ज्ञान काण्ड की पराकाष्ठा है। और सोचिए यह सब हमारे सनातन धर्म में विभिन्न संस्कारों और आश्रमों के माध्यम से बड़े सहज रूप से समझा दिया गया है।
इस तरह हम मानव प्राणियों की वृत्ति की प्रवृत्ति और निवृत्ति को सरल रीति से ऋषियों ने कठिन रीति से भी-
उत्तिष्ठत, जाग्रत प्राप्य वरान् निबोधत।
उठो ,जागो और एक के बाद एक श्रेष्ठ मार्ग पर बढ़ते हुए निवृत्त हो जाओ।
सुलभ कर दिया है। भगवान् और उनके प्रेमी भक्त जन कृपा करें।
।। हरिश्शरणम्।।
http://shishirchandra.com/2018/12/21/प्रवृत्ति-एवं-निवृत्ति/