नाम में देश-काल-पात्र का अविचार

भगवान् या भगवती का नाम स्मरण करने में देश-काल-पात्र का कोई भी विचार नहीं है। मतलब कि किसी भी जाति कुल में उत्पन्न कोई भी व्यक्ति भगवन्नाम के स्मरण में किसी भी स्थान अथवा काल में स्वतंत्र है। और इसका स्वारस्य ये भी है कि नाम का सतत मानसिक/हार्दिक स्मरण करने से अनायास ही वह स्वयं होने लगता है।इस तरह कि स्थिति को ही अजपा जप की स्थिति समझ सकते हैं।
गीता में भगवान् कहते भी हैं कि जिस जिस भाव को स्मरण करता हुआ प्राणी अन्त में शरीर त्यागता है ,वह उसी स्वरूप को प्राप्त कर लेता है-
यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजन्त्यन्ते कलेवरम्।
तं तमैवेति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः।।

अब इस बात यह भी तात्पर्य हुआ कि नाम स्मरण का विस्मरण किसी भी स्थिति में नहीं होना चाहिये। चैतन्य महाप्रभु भी इसी पर ऐकमत्य देते दीखते हैं। उनका कहना है कि हे भगवान्! आपने अनेक लोगों की अनेकानेक रुचियों को देखते हुए अपने नित्य-सिद्ध अनेक नामों को प्रकाशित कर दिया है। और इतना ही नहीं उन-उन नामों में अपनी सम्पूर्ण शक्ति भी भर दी है,जिनका स्मरण करने में किसी देश -काल-पात्र का कोई विचार नहीं।
ऐसे प्रभु-नाम-स्मरण से यह भवसागर आसानी से पार किया जा सकता है।और इस कलिप्रभावग्रस्त प्राणी के लिये इससे सुन्दर कोई साधन भी नहीं।कलिपावनावतार बाबा तुलसी अपनी सभी रचनाओं में इसे बारम्बार स्वीकारते हैं।प्रसिद्ध पंक्ति है-

कलियुग केवल नाम अधारा।
सुमिरि सुमिरि नर उतरहिं पारा।।

इस प्रसंग में एक बात बरबस स्मरण आती है। पिछले दो वर्ष पहले मेरे पिताजी का जब निधन हुआ, उसी दिन रात्रि में मेरे कन्तित ग्रामनिवासी पण्डित जी घर में पधारे। अनेक चर्चाओं के मध्य उन्होंने एक प्रश्न कर दिया कि भगवान् के नाम -रूप -लीला का अशुचि अवसरों पर भी स्मरण होता रहता है। क्या यह ठीक है या नहीं?
मैंने कहा महराज! यह तो मेरे साथ भी होता है और ऐसा अनेक ऐसे लोगों के साथ भी अवश्य ही होता होगा।इसमें तो हमारी विवशता ही दीखती है,क्या करें।
एक बात मैने उस अवसर पर यह भी कही कि , अपवित्र या पवित्र सभी दशाओं में ,किसी भी अवस्था को प्राप्त कर लेने पर भी ,भगवान् पुण्डरीकाक्ष का स्मरण मात्र ही व्यक्ति को बाहर-भीतर से पवित्र कर डालता है।

ओम् अपवित्रः पवित्रो वा,
सर्वावस्थां गतोपि वा।
यः स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं ,
स वाह्याभ्यन्तरः शुचिः।।

यह मन्त्र तो हम सभी अवसरों पर उच्चारण करते हैं और पवित्र हो जाते हैं।तब मुझे लगता है कि भगवद्स्मरण किसी भी दशा में हो जाय तो कोई हर्ज नहीं।यह तो सतत स्मरण का परिणाम है और होना भी चाहिए।
अस्तु , यह बात मेरे मन में अबकी बार के ” कल्याण ” अंक को देख कर उठी।
उसमें इसी प्रकार की बात अपने गुरुवर्य मलूक पीठाधीश्वर श्रीराजेन्द्रदास जी महाराज के शिक्षा गुरु गोलोकवासी सन्त श्रीगणेदास भक्तमाली जी के पत्र-पुष्प से उद्धृत है। जो बातें लिखी गई हैं, उनका उल्लेख मलूकपीठाधीश्वर श्रीमहाराज जी के सत्संग-प्रसंगों प्रायः होता रहता, जिसे अनेक बार मैंने भी सुना है और सुनकर रोमांचित होता रहता हूँ। दो घटनाओं का उल्लेख इस प्रकार है-

1- एक महात्मा शौच-क्रिया सम्पादन काल में अपनी जीभ को दाँतों से दबाए रहते थे, और निवृत्त होने पर ही उसे छोड़ते थे।इसलिए कि प्रभु-नाम न निकल जाय और प्रभु प्रकट न हो जायँ।ऐसी बात जान कर उनके एक शिष्य ने कहा कि महराज यदि ऊसी अवस्था में प्राण छूट गए तो क्या होगा? यह सुनकर उन सन्त ने अपने शिष्य को धन्यवाद दिया और स्वीकार किया कि भगवद् स्मरण अभ्यास वशात् किसी भी काल में होता है, तो यह तो होना ही चाहिए।ध्यान यही रहे वाचिक न हो।

2- दूसरी घटना में हनुमानजी महाराज और प्रभु श्रीराम का स्मरण हुआ है।
इसके अनुसार एक व्यवसायी को प्रभु स्मरण का समय नहीं मिलता था, तो वह शौच-क्रिया-सम्पादन-काल में ही भगवान् के नाम का मानस स्मरण कर लेता था। यह जानकर हनुमानजी को गुस्सा आता था।एक दिन उन्होंने उसकी पीठ पर एक लात से प्रहार कर दिया।भक्त को थोड़ी पीड़ा हुई, वह अपनी क्रिया सम्पादित करबाहर निकल आया। उधर हनुमानजी महाराज जब प्रभुश्रीराम की सेवा में पहुँचे, तब भगवान् ने कहा कि हनुमान् मेरी पीठ में बड़ी पीड़ा हो रही है। हनुमान् जी ने देखा और कारण पूछा।तब प्रभु ने कहा कि तुम्हींने ही मारा है। उन्होंने कहा कि मेरा भक्त ,जो शौच-क्रिया में मेरा स्मरण कर रहा था यदि उसे प्रहार लग जाता तो वह तो सिधार जाता, अतः तत्काल मुझे उसकी रक्षा करने के लिए अपनी पीठ वहाँ लगानी पड़ी। हनुमान् जी महाराज ने अपनी भूल स्वीकार करके प्रभु से क्षमा माँगी।
अस्तु इन घटनाओं और उनके उल्लेख का मतलब यही है कि भगवन्नाम का स्मरण सतत सभी पवित्रापवित्र कालों में हो सकता है।
सभी वर्णों में उत्पन्न भगवान् के भक्तों और यहाँ तक कि पशु-पक्षी योनियों में भी जन्मे प्राणियों को भी प्रभुनाम स्मरण ने जीवन से मुक्त कर परम लोक में प्रतिष्ठित कर दिया है-

गनिका गीध अजामिल तारे,
सबरो गो गजराज।
सूर पतित पावन करि कीजै,
बाँह गहे की लाज।

पतित पावन नाम को सार्थक करनेवाले परम प्रभु के नाम आश्रय ही मुक्ति का परम चरम उपाय है। और यह नामाश्रय कोई भी किसी भी काल में ग्रहण कर सकता है।यह मेरा मत नहीं अपितु भगवान् के सभी प्यारे भक्तों का अभिमत है। और जब श्रीभगवान् देश-काल से परे और सभी हाल में हममें तुममें खड़ग खम्भ में सनातन सतत सुप्रतिष्ठित हैं।तब उनसे परे कौन देश काल है ।अतः अणु-परमाणु में विद्यमान का निरन्तर स्मरण मुक्ति दायक हो-

हरेर्नाम हरेर्नाम हरेर्नामैव केवलम्।
कलौ नास्त्येव नास्त्येव नास्त्येव गतिरन्यथा

।।हरिश्शरणम्।।

http://www.shishirchandra.com/2018/11/16/नाम-में-देश-काल-पात्र-का-अव/

Unknown's avatar

Author: Prof. Shishir Chandra Upadhyay

I am Professor of Sanskrit subject in K.B.P.G College, Mirzapur, Uttar Pradesh, India, since 1991.

Leave a comment