मार्कण्डेयपुराण का पञ्चम अध्याय उत्तर चरित्र नाम से साधकों-भक्तों में प्रसिद्ध है।
उत्तर चरित्र के नाम की अन्वर्थता इस बात में भी प्रतीत होती है कि मानव-जीवन में प्राप्तव्य योग की उपलब्धि कैसे हो,क्योंकि यही जीवन जीवनान्त मुक्ति का द्वार है।
इसी मुक्ति की प्राप्ति को लक्षित करती हुई ऋषि-वाणी प्रवाहित होती है-
या देवी सर्वभूतेषु विष्णुमायेति शब्दिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।
उक्त मन्त्र में सर्वव्यापी भगवान् की सर्वभूतव्याप्ता माया को कुल चार बार प्रणाम किया जा रहा है:-
1-नमस्तस्यै
2-नमस्तस्यै
3-नमस्तस्यै
4-नमो नमः
इन चार प्रणामों में से तीन में एकरूप दिखाई पड़ता है- तस्यै नमः।
उस जगदम्बा को प्रणाम है और चतुर्थ में नमः नमः की आवृत्ति अर्थात् बारम्बार प्रणाम है।
यह तो उक्त मन्त्र का साधारण अर्थ है।
असाधारण और आध्यात्मिक अनुभूति वाले साधकों, महात्माओं ने इसे एक दूसरा अर्थ भी दिया है। वस्तुतः प्रथम नमस्तस्यै द्वारा भगवती के सक्षात् प्रत्यक्ष-गोचर स्थूल स्वरूप या स्थूल मूर्ति को प्रणाम निवेदन है और यह स्थूल प्रणति भी इस मानवीय शरीर के चर्म-चक्षु-गत अन्नमय शरीर द्वारा होता है। आत्माधार यह शरीर ही प्राथमिक दृष्टि से मूर्ति या भगवद्विग्रह को आधार बनाकर स्वयं की श्रद्धा को उपपादित करता है।
स्वामी विवेकानन्द जी ने भी यह बात स्वीकारी है कि उन्हें आधार और साधन युक्त साधना में प्रवृत्त करनेवाले उनके गुरु न मिले होते तो वे जीवन का चरम न जान पाते। निःसन्देह इस त्रिगुणात्मक शरीर को साधना के परम में पहुँचाने के लिए प्रथमतया स्थूल आधार की सहायता चाहिए , जो माता के स्थूल विग्रह द्वारा और स्थूल मुद्रादि के प्रकटीकरण पूर्वक ही सम्भव है। इस प्रकार यह प्रथम प्रणाम स्थूल द्वारा, स्थूल का कायिक-वाचिक रूप में होता है। ध्यान रहे कि इसी प्रथम चरण के प्रणाम से साधक को सालोक्य मुक्ति भी मिल सकती है।
द्वितीय नमस्तस्यै द्वारा वैज्ञानिक भाषा में हम स्थूल से सूक्ष्म की ओर अग्रसर होते ।त्रिविध शरीर का दूसरा सूक्ष्म भाग ही सूक्ष्म शरीर है। इसमें साधक की पञ्च-ज्ञानेन्द्रियाँ , मन -बुद्धि चित्ताहंकार भी आ जाता है। स्थूल शरीर का कारण रूप यही सूक्ष्म शरीर है ,जिससे पुनः -पुनः यह जीवात्मा स्थूल शरीरों को धारण करता रहता है।
अतः द्वितीय नमस्तस्यै का स्वारस्य सूक्ष्म शरीर के प्राणमय और मनोमय तत्वों के द्वारा जगन्माता के प्रणाम में विहित होता है। इसके द्वारा समीप्य – मुक्ति भी सम्भव हो जाती है।
अब तृतीय नमस्तस्यै पर विचारने पर इस सूक्ष्म शरीर का भी मूल कारण ,कारण शरीर प्रतीत होता है। इस कारण शरीर द्वारा भी श्रीमाता को प्रणाम निवेदित होता है। इसका रहस्य गत विज्ञानमय जीवात्मा स्थिर होता है। यह विज्ञान मय शरीर रुप जीवात्मा ही परमात्मा का चिदंश है। इसके द्वारा तद्बुद्धिगत भाव में प्रणाम निवेदन के द्वारा सारूप्य-मुक्ति की सम्भावना होती है।
अब चतुर्थ प्रणाम नमो नमः को विचारें तो यह कारणातीत शरीर का प्रणाम सिद्ध होता है।क्योंकि कारण का कारण तो कारणातीत ही स्वतः सिद्ध है। सर्वकारणकारण में तो एकत्व ही सिद्ध हो जाता है ,उसे शक्ति या शिव के रूप में पृथक् करके नहीं देखा जा सकता है।और शास्त्रकार यहीं शिवाशिवयोरभेदः की बात स्वीकारते दीखते हैं।
अतःयह चतुर्थ नमो नमः का प्रणाम भी तुरीय शुद्ध-बुद्ध ज्ञाता-ज्ञान-ज्ञेयस्वरूप सिद्ध होता दीखता है ,जहाँ नमस्तस्यै या नमस्तस्मै नहीं, वरन् केवल नमो नमः बन गया है। इस अन्तिम तुरीय चतुर्थ प्रणाम की परिणति परम आनन्दमयशरीर के लिए सर्वलयगत सायुज्य मुक्ति में है।
इस प्रकार जगन्माता के स्थूल, सूक्ष्म ,कारण और कारणातीत स्वरूप प्रणामों की शृंखला अनन्त कोटि ब्रह्माण्ड जननी को समर्पित है, जिसके भृकुटि विलास में सृष्टि और लय समाहित है।
।।हरिश्शरणम्।।