संसार के तमाम झंझावातों में चतुरस्र घिरा हुआ मानव कभी -कभी बहुत दुःखी हो जाता है।वह ऐसे विह्वल क्षणों में बार -बार अपने प्रारब्ध या पूर्वजन्म कृत दुष्कृतों का स्मरण करता है, जो उसे वर्तमान में ऐसी विकट परिस्थिति में डाल रखे हैं।
ऐसी परिस्थिति में सन्तों महात्माओं का एक सूत्र वाक्य स्मरण होना स्वाभाविक है-
दुःखे तु क्षीयते पापः।
सुखे पुण्यः प्रणश्यति।।
मतलब कि दुःख की विद्यमान घड़ी में ऐसा समझना चाहिए कि पाप नष्ट हो रहा है और सुखानुभूति काल में पुराकृत पुण्य का नाश हो रहा है।इस सनातन सत्य पर विचारते हुए यह भी अनुभव होना चाहिए कि यह मानव शरीर ही ऐसा है जो बार-बार के जन्म-मृत्यु के पाश से मुक्त करने का एकमात्र साधनोपाय है-
साधन धाम मोक्ष करि द्वारा।
पाइ न जे परलोक सँवारा।।
सारी विभीषिकाओं और झंझावातों में कर्मानुसार बारम्बार जन्मते और मरते हुए एक ऐसा अन्तिम सुखालब्धी प्रारब्ध बन जाता है, जिससे भगवान् की माया से रचित संसार की असारता का ज्ञान होने लगता है। और इसी कारण समग्र अनेक जन्मो के समूहीभूत पुण्य प्रसाद स्वरूप भगवच्चराणविन्दों में स्वतः प्रीति उत्पन्न होती है। यह भगवच्चराणविन्दों की रति प्रीति और प्रेम ही उनकी अविद्या माया के क्लेश को काटनेवाली और साक्षाद् आनन्दातिरेक का एकमेवाधार है-
माम् एव ये प्रपद्यन्ते।
मायाम् एतां तरन्ति ते।।
और
कलिपावनावतार बाबा तुलसीदास का आत्मज्ञान रसमय हो जाता है-
वेद पुरान सन्त मत एहू।
सकल सुकृत फल राम सनेहू।।
भगवान् सच्चिदानन्द कृपा करें।
।।हरिश्शरणम्।।