अहैतुकी भक्ति

अहैतुकी अर्थात् बिना किसी हेतु के भक्ति , सोचने पर बड़ा अटपटा सा लगता है।बिना किसी हेतु या कारण के इस संसार में कौन है जो किसी भी देवतादि की भक्ति करेगा। आज जहाँ भी देख लीजिए , जो भी पूजा, पाठ ,जप, तप,व्रत किये जा रहे हैं ,उन सबके पीछे कोई न कोई कामना अवश्य रहती है। यह कामना ही तो हेतु या कारण है, जिसकी पूर्ति के लिए हम देवार्चनादि में प्रवृत्त होते हैं।

अब प्रश्न यह है कि कामना-भेद से भिन्न-भिन्न देवी-देवताओं की पूजा अनादि काल से चली आ रही है – स्वर्गकामो यजेत , इत्यादि वेद -वाक्य प्रमाण हैं कि ,हमारे अनुष्ठान प्रायः सकाम,सहेतु ही प्रायोजित होते चले आ रहे रहे हैं। अब इसमें कठिनाई क्या है, यही कारण है बार -बार शरीर धारण के बन्धन से मुक्त न होने का। तब इसका मतलब है कि देवार्चन और अनुष्ठान तो हों ,किन्तु सभी सकाम या सहेतुक नहीं। वाल्मीकि प्रमाण हैं, कि महाराज दशरथ ने अपने जीवन भर अनेक यज्ञानुष्ठान निष्काम निर्हेतुक ही किए थे। विशेष परिस्थिति में अत्यन्त अनिवार्य होने पर ही उन्होंने-पुत्रकाम शुभ -यज्ञ करावा।
और गीतादि शास्त्र इस बात के प्रबल प्रमाण हैं कि- शरीर धारण किए हुए प्राणी का शरीर त्याग करना सुनिश्चित है।इसके बाद दूसरी अर्धाली में बड़ा जोर देकर यह बात भी आती है कि मरे हुए का जन्मना भी उतना ही सुनिश्चित है।
तब चार पुरुषार्थों में अन्तिम वाला मुक्ति क्या है? क्या श्रीभगवान् मुक्ति का कोई अन्य अर्थ स्वीकारते हैं। इसका उत्तर वह स्वयं देते हैं कि इस मुक्ति के लिए अनेक बार जन्म ग्रहण करते -करते शनैः शनैः मन और बुद्धि.की शुद्धि होते जाने से मुक्ति का मार्ग. प्रशस्त होता है।
जब भगवान् को भी यह प्रतीत होता कि अमुक व्यक्ति जन्म-मृत्यु के पाश से छूटना चाहता है।इसकी व्याकुलता चरम पर है, यह कर्म-भोग से त्रस्त हो गया है, तभी उसे अपनी ओर ऐसा आकृष्ट करते हैं, कि वह अनेक जन्मार्जित प्रारब्ध को तत्काल त्याग कर, सदा -सदा के लिए उनके वैकुण्ठ-धाम को प्राप्त कर लेता है।
इस मुक्ति के न होने का साधारण सा कारण स्पष्ट दीखता है कि जब तक हमारी भगवद्भक्ति या प्रीति किसी हेतु , कारण या कामना को लेकर होती रहती है हम मुक्त हो ही नहीं सकते।
क्योंकि कोई हेतु, कारण या कामना पूर्ण होते ही, दूसरी कामना आ जाती है और इसके बाद तीसरी और चौथी।इस तरह एक हेतु के बाद अनन्त हेतुओं की पूर्ति और इससे अनन्त जन्मों का बन्धन चक्रवत् चलता रहता है। जैसा कि ऊपर कहा जा चुका है कि सदाचार-सम्पन्न मनुष्य का जीवन जीते-जीते इन कामनाओं, हेतुओं से स्वतः वैराग्य होता है और मुक्ति का मार्ग स्वतः लक्ष्य पूर्ण कर लेता है, इसी को सोचकर भगवान् उत्तर देते हैं-

अनेक-जन्म-संसिद्धिः,
ततो याति परां गतिम्.

और इस सहेतुक, सकाम भक्ति की सारी प्रक्रिया में मेरे मन में भगवत्कृपया यह बात भी उपजती है कि, जब परमात्मा सभी से निर्हेतुक प्रेम करते हैं, यह तो उनका स्वभाव है।

अकारणकरुणावरुणालय श्रीभगवान् का स्वयं सिद्ध भाव अपने भक्त में प्रीति का होता है ,उन्हें कुछ भी नहीं चाहिए। अरे सर्व कारण कारण अपने भक्त को अपने स्वभाव का देखना चाहते हैं। उन्हें कुछ भी नहीं चाहिए।जो सबको सब कुछ देता है ,उसे क्या चाहिए?
अब ऐसे समझें कि जब परमात्मा का निर्हेतुक, निष्काम ,निष्कारण स्वभाव है, तब उनके अंशभूत जीवात्मा का भी मूल स्वरूप-स्वभाव जब तक निर्हेतुक नहीं होगा, तब तक मुक्ति असम्भव है।
अरे भाई भगवान् के अनेकानेक प्रह्लाद आदि भक्त हुए हैं, जिन्होंने भगवान् के बारम्बार वर याचना का आग्रह करने पर ,यही कहा था कि , हे भगवान्! मुझे अनेक जन्मों में आपने बहुत कुछ दिया है, और देते ही चले आ रहे हैं, अब मुझे कुछ भी नहीं चाहिए और यदि आपका देने का हठ ही है, तो अब यही दीजिए कि मेरे जन्म-जन्म का मँगतापना ही छूट जाय।
नित्य-मुक्त-जीवात्मा का मूल स्वभाव निर्हेतुक, निष्काम और निष्कारण ही है।वह जब अपने अंशी के इसी मूल भाव में होगा मुक्ति तभी होगी।
श्रीकृष्ण प्रेम में पागल हो जाने आग्रह हमारे श्रीरामकृष्ण परमहंस देव का था ,तो हमेशा श्रीकृष्ण- प्रेम में उन्मत्त रहनेवाले श्रीचैतन्य महाप्रभु भी इसी नाम -लीला और धाम में बेसुध रहते थे।और यही कारण है कि उन्होंने एकमात्र आठ पद्यों का शिक्षाष्टक ही स्वयं के जीवन में निर्देश किया था, जिसे उनकी कृति कहा जाता है।उनके परम षट् शिष्य-गणों- रूपगोस्वामी प्रभृति भगवद् भक्तों ने अनेक भक्ति-परक रचनाएँ और व्याख्याएँ रची हैं, जो रस-पिपासु भगवद्-भक्तों की अमूल्य निधियाँ हैं।
श्रीचैतन्य महाप्रभु ने जिस निर्हेतुक, निष्कारण और भक्ति के लिए भक्ति का अत्यन्त प्रेमवश उपदेश किया था, उसमें भी ,वही प्रहलाद जैसी प्रेमानुरक्ति ही प्रतीत होती है। यही नित्य मुक्त अंशी और उनके अपने अंशभूत जीवात्मा का स्वतः सिद्ध स्वभाव है।जब उन्हें कुछ भी नहीं चाहिए, तब इस अंशभूत तुच्छ को भी कुछ नहीं चाहिए।वे कहते हैं-

न धनं न जनं न सुन्दरीं
कवितां वा जगदीश कामये।
मम जन्मनि जन्मनीश्वरे
भवताद् भक्तिरहैतुकी त्वयि।।

ऐसी अहैतुकी भक्ति ही पुनरपि जननं पुनरपि मरणं पुनरपि जननी-जठरे-शयनं से से मुक्त कर सकती है।

श्रीकृष्ण! गोविन्द! हरे! मुरारे!
हे नाथ! नारायण! वासुदेव! मुरारे!

।।हरिश्शरणम्।।

https://shishirchandra.com/2018/11/22/अहैतुकी-भक्ति/

नाम में देश-काल-पात्र का अविचार

भगवान् या भगवती का नाम स्मरण करने में देश-काल-पात्र का कोई भी विचार नहीं है। मतलब कि किसी भी जाति कुल में उत्पन्न कोई भी व्यक्ति भगवन्नाम के स्मरण में किसी भी स्थान अथवा काल में स्वतंत्र है। और इसका स्वारस्य ये भी है कि नाम का सतत मानसिक/हार्दिक स्मरण करने से अनायास ही वह स्वयं होने लगता है।इस तरह कि स्थिति को ही अजपा जप की स्थिति समझ सकते हैं।
गीता में भगवान् कहते भी हैं कि जिस जिस भाव को स्मरण करता हुआ प्राणी अन्त में शरीर त्यागता है ,वह उसी स्वरूप को प्राप्त कर लेता है-
यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजन्त्यन्ते कलेवरम्।
तं तमैवेति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः।।

अब इस बात यह भी तात्पर्य हुआ कि नाम स्मरण का विस्मरण किसी भी स्थिति में नहीं होना चाहिये। चैतन्य महाप्रभु भी इसी पर ऐकमत्य देते दीखते हैं। उनका कहना है कि हे भगवान्! आपने अनेक लोगों की अनेकानेक रुचियों को देखते हुए अपने नित्य-सिद्ध अनेक नामों को प्रकाशित कर दिया है। और इतना ही नहीं उन-उन नामों में अपनी सम्पूर्ण शक्ति भी भर दी है,जिनका स्मरण करने में किसी देश -काल-पात्र का कोई विचार नहीं।
ऐसे प्रभु-नाम-स्मरण से यह भवसागर आसानी से पार किया जा सकता है।और इस कलिप्रभावग्रस्त प्राणी के लिये इससे सुन्दर कोई साधन भी नहीं।कलिपावनावतार बाबा तुलसी अपनी सभी रचनाओं में इसे बारम्बार स्वीकारते हैं।प्रसिद्ध पंक्ति है-

कलियुग केवल नाम अधारा।
सुमिरि सुमिरि नर उतरहिं पारा।।

इस प्रसंग में एक बात बरबस स्मरण आती है। पिछले दो वर्ष पहले मेरे पिताजी का जब निधन हुआ, उसी दिन रात्रि में मेरे कन्तित ग्रामनिवासी पण्डित जी घर में पधारे। अनेक चर्चाओं के मध्य उन्होंने एक प्रश्न कर दिया कि भगवान् के नाम -रूप -लीला का अशुचि अवसरों पर भी स्मरण होता रहता है। क्या यह ठीक है या नहीं?
मैंने कहा महराज! यह तो मेरे साथ भी होता है और ऐसा अनेक ऐसे लोगों के साथ भी अवश्य ही होता होगा।इसमें तो हमारी विवशता ही दीखती है,क्या करें।
एक बात मैने उस अवसर पर यह भी कही कि , अपवित्र या पवित्र सभी दशाओं में ,किसी भी अवस्था को प्राप्त कर लेने पर भी ,भगवान् पुण्डरीकाक्ष का स्मरण मात्र ही व्यक्ति को बाहर-भीतर से पवित्र कर डालता है।

ओम् अपवित्रः पवित्रो वा,
सर्वावस्थां गतोपि वा।
यः स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं ,
स वाह्याभ्यन्तरः शुचिः।।

यह मन्त्र तो हम सभी अवसरों पर उच्चारण करते हैं और पवित्र हो जाते हैं।तब मुझे लगता है कि भगवद्स्मरण किसी भी दशा में हो जाय तो कोई हर्ज नहीं।यह तो सतत स्मरण का परिणाम है और होना भी चाहिए।
अस्तु , यह बात मेरे मन में अबकी बार के ” कल्याण ” अंक को देख कर उठी।
उसमें इसी प्रकार की बात अपने गुरुवर्य मलूक पीठाधीश्वर श्रीराजेन्द्रदास जी महाराज के शिक्षा गुरु गोलोकवासी सन्त श्रीगणेदास भक्तमाली जी के पत्र-पुष्प से उद्धृत है। जो बातें लिखी गई हैं, उनका उल्लेख मलूकपीठाधीश्वर श्रीमहाराज जी के सत्संग-प्रसंगों प्रायः होता रहता, जिसे अनेक बार मैंने भी सुना है और सुनकर रोमांचित होता रहता हूँ। दो घटनाओं का उल्लेख इस प्रकार है-

1- एक महात्मा शौच-क्रिया सम्पादन काल में अपनी जीभ को दाँतों से दबाए रहते थे, और निवृत्त होने पर ही उसे छोड़ते थे।इसलिए कि प्रभु-नाम न निकल जाय और प्रभु प्रकट न हो जायँ।ऐसी बात जान कर उनके एक शिष्य ने कहा कि महराज यदि ऊसी अवस्था में प्राण छूट गए तो क्या होगा? यह सुनकर उन सन्त ने अपने शिष्य को धन्यवाद दिया और स्वीकार किया कि भगवद् स्मरण अभ्यास वशात् किसी भी काल में होता है, तो यह तो होना ही चाहिए।ध्यान यही रहे वाचिक न हो।

2- दूसरी घटना में हनुमानजी महाराज और प्रभु श्रीराम का स्मरण हुआ है।
इसके अनुसार एक व्यवसायी को प्रभु स्मरण का समय नहीं मिलता था, तो वह शौच-क्रिया-सम्पादन-काल में ही भगवान् के नाम का मानस स्मरण कर लेता था। यह जानकर हनुमानजी को गुस्सा आता था।एक दिन उन्होंने उसकी पीठ पर एक लात से प्रहार कर दिया।भक्त को थोड़ी पीड़ा हुई, वह अपनी क्रिया सम्पादित करबाहर निकल आया। उधर हनुमानजी महाराज जब प्रभुश्रीराम की सेवा में पहुँचे, तब भगवान् ने कहा कि हनुमान् मेरी पीठ में बड़ी पीड़ा हो रही है। हनुमान् जी ने देखा और कारण पूछा।तब प्रभु ने कहा कि तुम्हींने ही मारा है। उन्होंने कहा कि मेरा भक्त ,जो शौच-क्रिया में मेरा स्मरण कर रहा था यदि उसे प्रहार लग जाता तो वह तो सिधार जाता, अतः तत्काल मुझे उसकी रक्षा करने के लिए अपनी पीठ वहाँ लगानी पड़ी। हनुमान् जी महाराज ने अपनी भूल स्वीकार करके प्रभु से क्षमा माँगी।
अस्तु इन घटनाओं और उनके उल्लेख का मतलब यही है कि भगवन्नाम का स्मरण सतत सभी पवित्रापवित्र कालों में हो सकता है।
सभी वर्णों में उत्पन्न भगवान् के भक्तों और यहाँ तक कि पशु-पक्षी योनियों में भी जन्मे प्राणियों को भी प्रभुनाम स्मरण ने जीवन से मुक्त कर परम लोक में प्रतिष्ठित कर दिया है-

गनिका गीध अजामिल तारे,
सबरो गो गजराज।
सूर पतित पावन करि कीजै,
बाँह गहे की लाज।

पतित पावन नाम को सार्थक करनेवाले परम प्रभु के नाम आश्रय ही मुक्ति का परम चरम उपाय है। और यह नामाश्रय कोई भी किसी भी काल में ग्रहण कर सकता है।यह मेरा मत नहीं अपितु भगवान् के सभी प्यारे भक्तों का अभिमत है। और जब श्रीभगवान् देश-काल से परे और सभी हाल में हममें तुममें खड़ग खम्भ में सनातन सतत सुप्रतिष्ठित हैं।तब उनसे परे कौन देश काल है ।अतः अणु-परमाणु में विद्यमान का निरन्तर स्मरण मुक्ति दायक हो-

हरेर्नाम हरेर्नाम हरेर्नामैव केवलम्।
कलौ नास्त्येव नास्त्येव नास्त्येव गतिरन्यथा

।।हरिश्शरणम्।।

http://www.shishirchandra.com/2018/11/16/नाम-में-देश-काल-पात्र-का-अव/

प्रणाम-चतुष्टय

मार्कण्डेयपुराण का पञ्चम अध्याय उत्तर चरित्र नाम से साधकों-भक्तों में प्रसिद्ध है।
उत्तर चरित्र के नाम की अन्वर्थता इस बात में भी प्रतीत होती है कि मानव-जीवन में प्राप्तव्य योग की उपलब्धि कैसे हो,क्योंकि यही जीवन जीवनान्त मुक्ति का द्वार है।
इसी मुक्ति की प्राप्ति को लक्षित करती हुई ऋषि-वाणी प्रवाहित होती है-

या देवी सर्वभूतेषु विष्णुमायेति शब्दिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।

उक्त मन्त्र में सर्वव्यापी भगवान् की सर्वभूतव्याप्ता माया को कुल चार बार प्रणाम किया जा रहा है:-

1-नमस्तस्यै

2-नमस्तस्यै

3-नमस्तस्यै 

4-नमो नमः

इन चार प्रणामों में से तीन में एकरूप दिखाई पड़ता है- तस्यै नमः।
उस जगदम्बा को प्रणाम है और चतुर्थ में नमः नमः की आवृत्ति अर्थात् बारम्बार प्रणाम है।
यह तो उक्त मन्त्र का साधारण अर्थ है।
असाधारण और आध्यात्मिक अनुभूति वाले साधकों, महात्माओं ने इसे एक दूसरा अर्थ भी दिया है। वस्तुतः प्रथम नमस्तस्यै द्वारा भगवती के सक्षात् प्रत्यक्ष-गोचर स्थूल स्वरूप या स्थूल मूर्ति को प्रणाम निवेदन है और यह स्थूल प्रणति भी इस मानवीय शरीर के चर्म-चक्षु-गत अन्नमय शरीर द्वारा होता है। आत्माधार यह शरीर ही प्राथमिक दृष्टि से मूर्ति या भगवद्विग्रह को आधार बनाकर स्वयं की श्रद्धा को उपपादित करता है।
स्वामी विवेकानन्द जी ने भी यह बात स्वीकारी है कि उन्हें आधार और साधन युक्त साधना में प्रवृत्त करनेवाले उनके गुरु न मिले होते तो वे जीवन का चरम न जान पाते।  निःसन्देह इस त्रिगुणात्मक शरीर को साधना के परम में पहुँचाने के लिए प्रथमतया स्थूल आधार की सहायता चाहिए , जो माता के स्थूल विग्रह द्वारा और स्थूल मुद्रादि के प्रकटीकरण पूर्वक ही सम्भव है।  इस प्रकार यह प्रथम प्रणाम स्थूल द्वारा, स्थूल का कायिक-वाचिक रूप में होता है।  ध्यान रहे कि इसी प्रथम चरण के प्रणाम से साधक को सालोक्य मुक्ति भी मिल सकती है।
द्वितीय नमस्तस्यै द्वारा वैज्ञानिक भाषा में हम स्थूल से सूक्ष्म की ओर अग्रसर होते ।त्रिविध शरीर का दूसरा सूक्ष्म भाग ही सूक्ष्म शरीर है। इसमें साधक की पञ्च-ज्ञानेन्द्रियाँ , मन -बुद्धि चित्ताहंकार भी आ जाता है। स्थूल शरीर का कारण रूप यही सूक्ष्म शरीर है ,जिससे पुनः -पुनः यह जीवात्मा स्थूल शरीरों को धारण करता रहता है।
अतः द्वितीय नमस्तस्यै का स्वारस्य सूक्ष्म शरीर के प्राणमय और मनोमय तत्वों के द्वारा जगन्माता के प्रणाम में विहित होता है। इसके द्वारा समीप्य – मुक्ति भी सम्भव हो जाती है।
अब तृतीय नमस्तस्यै पर विचारने पर इस सूक्ष्म शरीर का भी मूल कारण ,कारण शरीर प्रतीत होता है। इस कारण शरीर द्वारा भी श्रीमाता को प्रणाम निवेदित होता है। इसका रहस्य गत विज्ञानमय जीवात्मा स्थिर होता है। यह विज्ञान मय शरीर रुप जीवात्मा ही परमात्मा का चिदंश है। इसके द्वारा तद्बुद्धिगत भाव में प्रणाम निवेदन के द्वारा सारूप्य-मुक्ति की सम्भावना होती है।
अब चतुर्थ प्रणाम नमो नमः को विचारें तो यह कारणातीत शरीर का प्रणाम सिद्ध होता है।क्योंकि कारण का कारण तो कारणातीत ही स्वतः सिद्ध है। सर्वकारणकारण में तो एकत्व ही सिद्ध हो जाता है ,उसे शक्ति या शिव के रूप में पृथक् करके नहीं देखा जा सकता है।और शास्त्रकार यहीं शिवाशिवयोरभेदः की बात स्वीकारते दीखते हैं।
अतःयह चतुर्थ नमो नमः का प्रणाम भी तुरीय शुद्ध-बुद्ध ज्ञाता-ज्ञान-ज्ञेयस्वरूप सिद्ध होता दीखता है ,जहाँ नमस्तस्यै या नमस्तस्मै नहीं, वरन् केवल नमो नमः बन गया है। इस अन्तिम तुरीय चतुर्थ प्रणाम की परिणति परम आनन्दमयशरीर के लिए सर्वलयगत सायुज्य मुक्ति में है।
इस प्रकार जगन्माता के स्थूल, सूक्ष्म ,कारण और कारणातीत स्वरूप प्रणामों की शृंखला अनन्त कोटि ब्रह्माण्ड जननी को समर्पित है, जिसके भृकुटि विलास में सृष्टि और लय समाहित है।

।।हरिश्शरणम्।।

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भगवद् रति

संसार के तमाम झंझावातों में चतुरस्र घिरा हुआ मानव कभी -कभी बहुत दुःखी हो जाता है।वह ऐसे विह्वल क्षणों में बार -बार अपने प्रारब्ध या पूर्वजन्म कृत दुष्कृतों का स्मरण करता है, जो उसे वर्तमान में ऐसी विकट परिस्थिति में डाल रखे हैं।
ऐसी परिस्थिति में सन्तों महात्माओं का एक सूत्र वाक्य स्मरण होना स्वाभाविक है-

दुःखे तु क्षीयते पापः।
सुखे पुण्यः प्रणश्यति।।

मतलब कि दुःख की विद्यमान घड़ी में ऐसा समझना चाहिए कि पाप नष्ट हो रहा है और सुखानुभूति काल में पुराकृत पुण्य का नाश हो रहा है।इस सनातन सत्य पर विचारते हुए यह भी अनुभव होना चाहिए कि यह मानव शरीर ही ऐसा है जो बार-बार के जन्म-मृत्यु के पाश से मुक्त करने का एकमात्र साधनोपाय है-

साधन धाम मोक्ष करि द्वारा।
पाइ न जे परलोक सँवारा।।

सारी विभीषिकाओं और झंझावातों में कर्मानुसार बारम्बार जन्मते और मरते हुए एक ऐसा अन्तिम सुखालब्धी प्रारब्ध बन जाता है, जिससे भगवान् की माया से रचित संसार की असारता का ज्ञान होने लगता है। और इसी कारण समग्र अनेक जन्मो के समूहीभूत पुण्य प्रसाद स्वरूप भगवच्चराणविन्दों में स्वतः प्रीति उत्पन्न होती है। यह भगवच्चराणविन्दों की रति प्रीति और प्रेम ही उनकी अविद्या माया के क्लेश को काटनेवाली और साक्षाद् आनन्दातिरेक का एकमेवाधार है-

माम् एव ये प्रपद्यन्ते।
मायाम् एतां तरन्ति ते।।

और
कलिपावनावतार बाबा तुलसीदास का आत्मज्ञान रसमय हो जाता है-

वेद पुरान सन्त मत एहू।
सकल सुकृत फल राम सनेहू।।

भगवान् सच्चिदानन्द कृपा करें।

।।हरिश्शरणम्।।

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