भगवत् कृपा

राम भजत सोइ मुक्ति गोसाईं।
अन इच्छित आवै बरिआईं।।

राम नाम रटते रटते जीवन के विषादों से मुक्ति मिलती है।
दूसरी पंक्ति का अर्थ बड़ा विचित्र है-

अन इच्छित अर्थात् जिसकी कभी इच्छा या कल्पना नहीं हुई, ऐसी लौकिक या पारलौकिक कामनाएं भी अकस्मात् पूरी हो जाती हैं।
यह कामनाएं सिद्धियों के रूप में प्रकट हो जाती हैं। यानी कि व्यक्ति सिद्ध भावापन्न हो जाता है।
और यह सारा कुछ सब कुछ राम नाम को जिह्वा पर धारण करने पर होता है।

क्योंकि नाम और नामी में कोई भेद नहीं ।
हम जिस व्यक्ति का नाम लेकर उसे पुकारते हैं, वही व्यक्ति उस नाम से उपस्थित होता है।
तब राम नाम लेने पर राम क्यों नहीं आयेंगे।इसमें कोई सन्देह नहीं है ,वे अवश्य आयेंगे।
और एक बात और होगी ,वह ये कि
बुद्धिमतां वरेण्य हनुमानजी महाराज भी स्वतः प्रकट रहेंगे।
क्योंकि जहाँ-जहाँ श्रीरामजी का स्मरण होगा, वहाँ-वहाँ भक्तराज शिवावतार भी रहेंगे। और नामजापक तो लोकालोक सिद्धियों को पा लेगा।

क्योंकि ये ” यत्र-यत्र रघुनाथकीर्तनं तत्र-तत्र कृतमस्तकाञ्जलिम् ” जो हैं।
अतः – अन इच्छित आवै बरिआईं।

भगवान् कृपा करें कि उनकी विस्मृति क्षण मात्र के लिए भी न हो।

।।हरिश्शरणम् ।।

https://shishirchandrablog.wordpress.com/2018/09/25/भगवत्-कृपा/

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Author: Prof. Shishir Chandra Upadhyay

I am Professor of Sanskrit subject in K.B.P.G College, Mirzapur, Uttar Pradesh, India, since 1991.

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